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पाप छोड़े बिना पाप के फल से बचने की कोई व्यवस्था नहीं है || B.B. Ravindra ji Aatman pravachan

Автор: Swadhyay Group

Загружено: 2017-03-01

Просмотров: 25549

Описание: प्रिय आत्मन,

“महा भाग्य से जिन शासन पाया, ज्ञानाभ्यास करेंगे हम |
अपना मन नहीं भटकायेंगे, जिनवर पंथ चलेंगे हम |”

जिसमें कर्म का प्रागेव (पहेले से) अभाव है, जो कर्म द्वारा किया नहीं जाता एवं जो कर्म को करता भी नहीं है ऐसा परम निष्कर्म तत्व ही अवलंबने योग्य है अथॉत् वही स्वरूप अपना मानने लायक है, अनुभवने लायक है ।

जैसे राजा को वरण करने वाली स्त्री रानी कहलाती है वैसे जो स्वभाव से ही प्रभु है, ज्ञानानंद स्वभावी है उसे वरण (अपनत्व) करने वाले को प्रभुता अवश्य मिलती है, वह प्रभु कहलाता है ।

यह निष्कर्म तत्व के अनुभवने से ही सुखी हुआ जाता है । निष्कर्म तत्व के अवलंबन से ही निष्कर्म दशा की प्राप्ति होती है, जो सुखमय है । उसी को दशॉनेवाले देव-शास्त्र-गुरु ही हमारे लिए एकमात्र विश्वास करने लायक है । जिनके सेवन से हमारे लौकिक और अलौकिक दोनों प्रयोजन की सिद्धि सहज में होती है ।

ज्ञानी को निर्विकल्प अवस्था में तो निष्कर्म तत्व का अवलंबन होता ही है, सविकल्प दशा में भी परोक्ष रुप से, उसके चिंतन, विचार, मनन के रुप में भी एक मात्र शुद्धात्मा ही अवलंबन योग्य होता है ।

जब जीव को निणॅय के बल से अपना स्वरुप सच्चा लगता है, वही उसकी सम्यक्त्व की पात्रता है और उसे स्वानुभव से प्रमाण करता है वही सम्यक्त्व है ।

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पाप छोड़े बिना पाप के फल से बचने की कोई व्यवस्था नहीं  है || B.B. Ravindra ji Aatman pravachan

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