Guru-rūpā Lalitā: Madhav Sharan
Автор: Ashutosh Mishra
Загружено: 2026-03-09
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गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२॥
गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२॥
अन्तर्गुरुर्भव मे ललिते ज्ञानप्रदीपिका
मोहतमः हर मे ललिते बुद्धिं कृपा कुरु ॥२॥
गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२॥
अन्तर्गुरुर्भव मे ललिते ज्ञानप्रदीपिका
मोहतमः हर मे ललिते बुद्धिं कृपा कुरु ॥२॥
गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२॥
अज्ञानघनतमसि हृदि मे बद्धोऽस्मि संसारः
त्वत्पादस्मरणमात्रे नश्यतु वेद्यतमः ॥२॥
अज्ञानघनतमसि हृदि मे बद्धोऽस्मि संसारः
त्वत्पादस्मरणमात्रे नश्यतु वेद्यतमः ॥२॥
गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२॥
गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२॥
यत्पश्यामि गुरौ देवि तत्तव तेजोमयम्
बाह्यगुरौ नमस्कुर्म्यन्तस्त्वां वन्दे सदा ॥२॥
यत्पश्यामि गुरौ देवि तत्तव तेजोमयम्
बाह्यगुरौ नमस्कुर्म्यन्तस्त्वां वन्दे सदा ॥२॥
गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२–३॥
त्वमेव गुरुर्मे देवि त्वमेव शरण्यम्
त्वमेव हृदये नित्यं प्रकाशस्व ललिते ॥२॥
त्वमेव गुरुर्मे देवि त्वमेव शरण्यम्
त्वमेव हृदये नित्यं प्रकाशस्व ललिते ॥२॥
गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२॥
मूढचेताः शिष्योऽस्मि ते क्षन्तव्यो मे अपराधः
शरणागतवत्सले देवि रक्ष रक्ष ललिते ॥२॥
मूढचेताः शिष्योऽस्मि ते क्षन्तव्यो मे अपराधः
शरणागतवत्सले देवि रक्ष रक्ष ललिते ॥२॥
गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२–३॥
मन्त्ररूपे जपे देवि नामरूपे विराजसे
“ललिते ललिते” नित्यं जप्त्वा तिष्ठे शिवेप्सितः ॥२॥
मन्त्ररूपे जपे देवि नामरूपे विराजसे
“ललिते ललिते” नित्यं जप्त्वा तिष्ठे शिवेप्सितः ॥२॥
गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२॥
वाङ्मनःकायकर्माणि सर्वं ते समर्पितम्
यत्किञ्चिद् शुभमस्ति मे तत्तव प्रसादेन ॥२॥
वाङ्मनःकायकर्माणि सर्वं ते समर्पितम्
यत्किञ्चिद् शुभमस्ति मे तत्तव प्रसादेन ॥२॥
गुरुरूपे ललिते मां पालय पालय
हृदि देवि ललिते मां पालय पालय ॥२॥
ज्ञानानन
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