धर्म और स्त्री। बंधन कि एक लंबी परम्परा
Автор: The Boby official
Загружено: 2026-02-15
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धर्म और नारी: बंधन की एक लंबी परंपरा
पिछले कई सदियों से औरत को धर्म के नाम पर बाँध कर रखा गया है। धर्म का उपयोग उसे मार्ग दिखाने के लिए नहीं, बल्कि नियंत्रित करने के लिए अधिक किया गया। कहा गया कि स्त्री का धर्म है सेवा करना, सहन करना, चुप रहना और हर स्थिति में त्याग करना।
बचपन में उसे सिखाया गया कि “अच्छी लड़की” वही है जो सवाल न करे। विवाह के बाद कहा गया कि पति ही उसका ईश्वर है। विधवा हुई तो उसके जीवन से रंग, हँसी और सपने छीन लिए गए। हर मोड़ पर धर्म के नियम स्त्री के लिए कठोर रहे, लेकिन पुरुष के लिए वही नियम लचीले।
धर्म ने स्त्री को देवी भी बनाया, लेकिन सिर्फ पूजा की मूर्ति की तरह — जिसे सम्मान तो मिले, पर अधिकार नहीं। उसे लक्ष्मी कहा गया, पर संपत्ति पर अधिकार नहीं दिया गया। दुर्गा कहा गया, पर अपनी लड़ाई लड़ने की आज़ादी नहीं दी गई।
असल समस्या धर्म नहीं, बल्कि धर्म की पुरुषवादी व्याख्या है। ईश्वर ने स्त्री को कमजोर नहीं बनाया, लेकिन समाज ने धर्म की आड़ में उसे कमजोर साबित करने की कोशिश की।
आज भी कई औरतें अपने फैसले खुद नहीं ले पातीं, क्योंकि उन्हें डराया जाता है — पाप लगेगा, समाज क्या कहेगा, धर्म के खिलाफ हो जाएगा। इस तरह धर्म आस्था नहीं, बल्कि नियंत्रण का हथियार बन गया है।
सच तो यह है कि जब तक औरत को इंसान से पहले “धार्मिक भूमिका” में बाँध कर देखा जाएगा, तब तक वह आज़ाद नहीं हो सकती। आज़ादी तभी आएगी जब धर्म और डर के बीच नहीं, बल्कि विवेक और समानता के बीच खड़ी होगी।नारी की स्थिति –
भारतीय समाज में नारी का स्थान हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन समय-समय पर उसकी स्थिति में कई बदलाव आए हैं। प्राचीन काल में नारी को देवी का स्वरूप माना जाता था। उसे सम्मान, शिक्षा और समान अधिकार प्राप्त थे। गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी स्त्रियाँ वेदों पर शास्त्रार्थ करती थीं और समाज में उनकी राय को महत्व दिया जाता था।
मध्यकाल में नारी की स्थिति कमजोर होती चली गई। बाल विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा और अशिक्षा जैसी कुरीतियों ने महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया। उन्हें अपने निर्णय लेने का अधिकार नहीं था और उनका जीवन पुरुषों पर निर्भर हो गया।
आधुनिक काल में नारी की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। आज महिलाएँ शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, नौकरी कर रही हैं और डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, पुलिस और नेता जैसे पदों पर कार्य कर रही हैं। वे अब सिर्फ घर संभालने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के विकास में भी बराबरी से योगदान दे रही हैं।
हालाँकि स्थिति पूरी तरह आदर्श नहीं है। आज भी कई जगह महिलाओं को भेदभाव, घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। समाज में सोच बदल रही है, लेकिन बदलाव की गति अभी धीमी है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पहले की तुलना में आज नारी की स्थिति काफी बेहतर हुई है, परंतु पूर्ण समानता अभी भी लक्ष्य है। जब समाज स्त्री और पुरुष को समान दृष्टि से देखेगा, तभी वास्तव में नारी सशक्तिकरण संभव होगा।
आज भी नारी की वास्तविक स्थिति यह है कि भले ही समय बदल गया हो, तकनीक आगे बढ़ गई हो, कानून बन गए हों, लेकिन आज भी बहुत सी महिलाएँ घरों की चारदीवारी में कैद हैं। पहले उन्हें परंपराओं ने बाँधा था, आज उन्हें सोच ने बाँध रखा है।
पुरुषों की मानसिकता में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। आज भी कई जगह स्त्री को कमजोर, निर्भर और केवल घर संभालने वाली माना जाता है। उसकी पढ़ाई, उसके सपने और उसके फैसले अब भी अक्सर पुरुषों की अनुमति पर निर्भर होते हैं।
समाज बाहर से आधुनिक दिखता है, लेकिन भीतर से अब भी पितृसत्तात्मक सोच से ग्रस्त है। स्त्री काम करे तो भी घर की पूरी जिम्मेदारी उसी की मानी जाती है, और अगर वह आवाज उठाए तो उसे गलत समझा जाता है।
असल बदलाव तब होगा जब कानून नहीं, बल्कि सोच बदलेगी। जब पुरुष स्त्री को बराबरी का इंसान समझेगा, बोझ नहीं। जब औरत को आज़ादी “दी” नहीं जाएगी, बल्कि उसका अधिकार माना जाएगा।
आज भी औरत आज़ाद नहीं है, बस उसकी ज़ंजीरें थोड़ी बदल गई हैं — लोहे की जगह अब सामाजिक सोच की हैं।आज के दौर में नारी को क्या सीखने की ज़रूरत है
आज जिस तरह पुरुषों का घिनौना और हिंसक रूप सामने आ रहा है, उसने समाज की असल सच्चाई उजागर कर दी है। यह सिर्फ कुछ व्यक्तियों की समस्या नहीं, बल्कि एक सोच की बीमारी है — जिसमें स्त्री को आज भी वस्तु, अधिकार या नियंत्रण की चीज़ समझा जाता है। ऐसे माहौल में नारी के लिए सबसे बड़ा सबक है: खुद को कमजोर समझना छोड़ना।
सबसे पहले औरत को मानसिक रूप से मजबूत बनना होगा।
नारी को अब देवी नहीं, योद्धा बनना होगा। क्योंकि इस दुनिया में सबसे खतरनाक चीज़ औरत का कमजोर होना नहीं, बल्कि अपनी ताकत से अनजान होना है।औरत ही औरत की असली ताकत
एक अच्छे समाज का निर्माण तभी होगा जब औरत, औरत को समझेगी। यह बात जितनी सरल लगती है, उतनी ही कठिन भी है, क्योंकि आज सबसे ज़्यादा जजमेंट, तुलना और दबाव कई बार औरत पर औरत ही डालती है। सास-बहू, ननद-भाभी, मां-बेटी, कामकाजी और गृहिणी — हर रिश्ते में कहीं न कहीं प्रतिस्पर्धा और ताना देखने को मिलता है।
समाज ने औरत को ऐसा ढाल दिया है कि वह खुद उसी सोच को आगे बढ़ाने लगती है जिसने उसे दबाया है। एक औरत दूसरी औरत से कहती है — “हमने तो सहा, तुम भी सहो”, “इतनी आज़ादी ठीक नहीं”, “लड़की को इतना बोलना शोभा नहीं देता।” यही बातें सबसे बड़ी रुकावट बन जाती हैं।
अगर औरत, औरत को जज करने की बजाय समझे, तो आधी लड़ाई वहीं खत्म हो जाए। अगर वह पूछे — तुम क्या चाहती हो? तुम पर क्या बीत रही है? — तो समाज अपने आप बदलने लगेगा।
औरत का सशक्तिकरण सिर्फ पुरुष से लड़ने में नहीं है, बल्कि उस मानसिकता से लड़ने में है जो औरत के अंदर ही बैठा दी गई है। जिस दिन औरत, औरत की पीठ बनेगी, उस दिन किसी पुरुष की ज़ंजीर उसे बाँध नहीं पाएगी।
सच यही है:
औरत को सबसे पहले जिस इंसान की ज़रूरत है, वो कोई मर्द नहीं — एक औरत है।**
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