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स्वसंवेद की शास्त्रीय विवेचना।

Автор: SPJIN

Загружено: 2025-01-05

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Описание: स्वसंवेद (पांचवें वेद) की शास्त्रीय विवेचना।
वक्ता- श्री राजन स्वामी
सृष्टि के आरम्भ से ही मनीषियों के हृदयपटल पर ये प्रश्न प्रस्फुटित हुए जिनके समाधान में सभी ऋषि-महर्षि प्रयासरत रहे हैं कि 1- मैं कौन हूं? 2 कहां से आया हूं? 3- मेरी आत्मा का प्रियतम कौन है? 4- कहां है? 5- कैसा है? 6- क्या करता है? 7- और उसको पाने का मार्ग क्या है?
इन प्रश्नों के उत्तर की खोज में ही अध्यात्म की यात्रा प्रारंभ होती है और उत्तर प्राप्ति ही अध्यात्म का परम लक्ष्य है |
इसी उत्तर की खोज में जब हम धर्मग्रंथों में दृष्टिपात करते हैं तो पता चलता है कि सभी ग्रन्थों में इनका केवल संकेतों में उत्तर दिया गया है | श्री प्राणनाथ जी की वाणी उन सभी संकेतों को खोलकर उनमें सामंजस्य स्थापित करती है इसीलिये इसे तारतम्य ज्ञान भी कहा जाता है| अपने आत्मस्वरूप की पहचान के लिये आवश्यक सम्पूर्ण ज्ञान निहित होने से इसे स्वसंवेद कहा जाता है | प्रस्तुत प्रवचन में शास्त्रोक्त उन्हीं कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया है जिससे यह जाना जा सके कि ऐसा क्या कारण है कि श्री प्राणनाथ जी की वाणी को ही स्वसंवेद कहा जाय?
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श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ के मुख्य उद्देश्य -
ज्ञान, शिक्षा, उच्च आदर्श, पावन चरित्र व भारतीय संस्कृति का समाज में प्रचार करना तथा वैज्ञानिक सिद्धांतो पर आधारित आध्यात्मिक मूल्य द्वारा मानव को महामानव बनाना और श्री प्राणनाथ जी की ब्रम्हवाणी के द्वारा समाज में फ़ैल रही अंध-परम्पराओं को समाप्त करके सबको एक अक्षरातीत की पहचान कराना।

अति महत्वपूर्ण नोट :-
यह पंचभौतिक शरीर हमेशा रहने वाला नहीं है।
प्रियतम परब्रह्म को पाने के लिये यह सुनहरा अवसर है।
अतः बिना समय गवाएं उस अक्षरातीत पाने के लिये प्रयास करना चाहिये।

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1. परिकरमा + सागर + सिनगार + खिलवत टीका
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आत्मिक दृष्टि से परमधाम, युगल स्वरुप तथा अपनी परआत्म को देखना ही चितवनि (ध्यान) है। चितवनि के बिना आत्म जागृति संभव नहीं है। संसार की अब तक की प्रचलित सभी ध्यान पद्धतियाँ निराकार-बेहद से आगे नहीं जाती हैं। तारतम ज्ञान के प्रकाश में मात्र निजानन्द योग ही परमधाम ले जा सकता है।

प्रियतम अक्षरातीत की चितवनि में इतना आनन्द है कि उसके सामने संसार के सभी सुख मिलकर भी कहीं नहीं ठहरते। यही कारण है कि ध्यान का आनन्द पाने के लिये ही राजकुमार सिद्धार्थ, महावीर, भर्तृहरि आदि ने अपने राज-पाट को छोड़ दिया और वनों में ध्यानमग्न रहे।

बेहद मण्डल - इस प्राकृतिक जगत् से परे वह बेहद मण्डल है, जिसे योगमाया का ब्रह्माण्ड कहते हैं। चारों वेदों में इसे चतुष्पाद विभूति के रूप में वर्णित किया गया है। इस मण्डल में अक्षर ब्रह्म के चारों अन्तःकरण (मन, चित, बुद्धि तथा अहंकार) की लीला होती है, जिन्हें क्रमशः अव्याकृत, सबलिक, केवल और सत्स्वरूप कहते हैं।

परमधाम - बेहद मण्डल से परे वह स्वलीला अद्वैत परमधाम है, जिसके कण-कण में सच्चिदानन्द परब्रह्म की लीला होती है। यह अनादि है, अनन्त है और सच्चिदानन्दमय है। जिस प्रकार सागर अपनी लहरों से तथा चन्द्रमा अपनी किरणों लीला करता है, उसी प्रकार अक्षरातीत भी अपनी अभिन्न स्वरूपा अंगरूपा आत्माओं के साथ अद्वैत लीला करते हैं, जो अनादि है और इसमें कभी अलगाव नहीं होता है।

वेदों ने इसी परमधाम के सम्बन्ध में “त्रिपादुर्ध्व उदैत्पुरुष” अर्थात् परब्रह्म योगमाया से परे है, कहकर मौन धारण कर लिया। मुण्डकोपनिषद् ने भी 'दिव्य ब्रह्मपुर' शब्द का प्रयोग तो किया, किन्तु उसे बेहद मण्डल (केवल ब्रह्म) में मान लिया। कुरआन में मेयराज के वर्णन के द्वारा संकेत किये जाने पर भी मुस्लिम जगत अभी इसकी वास्तविकता से बहुत दूर है।

श्री प्राणनाथजी की अलौकिक तारतम वाणी में इस परमधाम की शोभा, लीला एवं आनन्द का विशद रूप में वर्णन किया गया है, जिसका सुख किसी सौभाग्यशाली को ही प्राप्त होता है।

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स्वसंवेद  की शास्त्रीय विवेचना।

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