Origin of THE KALACHURIS || kalachuri itihas कलचुरी इतिहास | KALCHURI RAJVANSH | KALACHURI RAJPUT ||
Автор: कल्चुरी इतिहास
Загружено: 2024-02-28
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Origin of THE KALACHURIS || kalachuri itihas कलचुरी इतिहास || HAIHAYAVANS || KALACHURI RAJPUT || @Kalachuri_itihasa
कलचुरी इतिहास
उत्पत्ति और प्राचीनता
इस वंश का कलचुरि सबसे अधिक प्रचलित नाम है। परन्तु इस नाम के विविध रूप कल्च्चुरि, कल्च्छुरि, कलत्सुरि, कलचुरि इत्यादि स्वयं कलचुरियों तथा अन्य राजवंशों के प्राचीन अभिलेखों में प्राप्त होते हैं।
प्राचीन भारतीय मध्यकालीन राजपूत राजवंशों के समान कलचुरियों की उत्पत्ति भो अस्पष्ट और अनिश्चित है। कलचुरियों की उत्पत्ति विषयक समस्या के सम्बन्ध में दो प्रमुख मत है। प्रथम भारतीय उत्पति का सिद्धान्त और दूसरा विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त।
विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त
चन्द वरदाई के पृथ्वीराज रासी में परमार, प्रतीहार चाहान और चालुक्य राजवंशों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से बताई गई है। इसी के आधार पर डीआर भण्डारकर का कथन है कि हिन्दू धर्म का संरक्षण करने वाला और अपने देश की स्वतंत्रता के लिए जी-जान से संघर्ष करने वाला राजवंश मूलतः विदेशी था, जिसे यज्ञ संस्कार से हिन्दू धर्म में समाविष्ट किया गया। परन्तु इसके लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं है। निस्सन्देह प्राचीनकाल में भारत पर आक्रमण करने कली शक, कुषाण, हुण आदि जातियां को हिन्दू धर्म में आत्मसात कर लिया गया। परन्तु इस तथ्य का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि परमार, चालुक्य आदि के विषय में ऐसा ही हुआ होगा। उपर्युक्त चार राजवंशों में से केवल परमार वंश के अभिलेखों में उनके मूल पुरुष की उत्पति अर्बुद पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ की होमाग्नि से बताई जाती है। अन्य राजवंश सूर्य अथवा चन्द्र से अपनी उत्पत्ति बतलाते हैं। सूर्य और चन्द्र के समान ही भारतीयों के लिए पून्य अग्नि से परमारों द्वारा अपनी उत्पत्ति जोड्ना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। इसी अवधारणा के परिणामस्वरूप अग्निकुल सम्बन्धी उत्पत्ति की कल्पना की गई, जिसका सर्वप्रथम उल्लेख पद्मगुप्त कृत नवस्साहसांकचरित नामक काव्य में मिलता है।
डॉ. भण्डारकार का कथन है कि तथाकथित परमारादि अग्निकुल वंश के समान ही हैहय वंश भी मूलतः विदेशी है। अपने कचन की पुष्टि के लिए वे हरिवंश पुराण और विष्णुपुराण का उल्लेख करते हैं, जिसमें कहा गया है कि शक, यवन, पारद, खश आदि जातियों की सहायता से हैहय ने भारतीय राजा बाहु के राज्य पर अपना अधिकार कर लिया था। डॉ. भण्डारकर ने यह अनुमान किया कि क्योंकि शक, यवन विदेशो थे, अत: हैहय वंश भी विदेशी होगा। किन्तु यह मत पूर्णतया निराधार है। विदेशी जातियों से सहायता लेने मात्र से कोई विदेशी नहीं हो जाता। तालजंघ अथवा हैहय और बाहु के समय शक, यवनादि शक्तियों का अस्तित्व ही नहीं था। यदि केवल पुराणों को ही सत्य मान कर चलना है, तब पुराणों के इस तथ्य को क्यों असत्य माना जाय कि हैहय का जन्म यदुवंश में हुआ था। अतः कलचुरियों को विदेशी मूल का नहीं माना जा सकता।
भारतीय उत्पत्ति का सिद्धान्त
त्रिपुरी, सरयूपार और रतनपुर के कलचुरियों के अभिलेखीय साक्ष्यों के वंशावली वर्णन में अनुश्रुति एवं पौराणिक आख्यानों का समावेश है, जिसका विस्तृत विवरण पुराणों में उपलब्ध होता है। इस प्रकार से कलचुरियों के बिलहरी अभिलेख', सरयूपार के कलचुरियों के कसिया अभिलेख और रतनपुर के कलचुरि शासक जाज्जलदेव के अभिलेखों में उल्लेख है कि हैहयवंशियों का पूर्वज कृतवीर्य का जन्म चन्द्रवंश में हुआ था। कलचुरि कर्ण के वाराणसी ताम्रपत्र तथा रतनपुर के सभी ताम्रपत्रों में कृतवीर्य को मनु वैवस्वत के परिवार में उत्पन्न बताया गया है।" इस प्रकार कलचुरियों को प्राचीन सूर्य वंश एवं चन्द्रवंश से सम्बन्धित माना गया है। इस तथ्य की पुष्टि खैरहा ताम्रपत्र' और जबलपुर ताम्रपत्रों से होती है, जहां बोधन अथवा बुध का वर्णन आदिशासक के रूप मे चंद्रवंश से बताया गया है और उसे सूर्य वंश का जमाता कहा गया हैं|
कलचुरियों के अनेक ताम्रपत्रों में गर्वपूर्वक कहा गया है कि उनके वंश की उत्पत्ति हैहय कार्तवीर्य से हुई और इसीलिए वे हैहय अथवा हैहय वंशज कहलाये। कुछ अभिलेखों में दी गई कलचुरि-वंशावली में क्षीरसमुद्र से उत्पन्न चन्द्र, उसके पुत्र बुध, उसके पुत्र पुरुरवा, उसके वंश में उत्पन्न भरत चक्रवर्ती और हैहय चक्रवर्ती कार्तवीर्य की चर्चा मिलती है, जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है, जिससे स्पष्ट है कि कलचुरि स्वयं को सामान्यतः सोमवंशी और विशेषरूप से हैहय वंशी मानते हैं।
उपर्युक्त विश्वास मानने का एक प्रमुख कारण यह था कि कलचुरियों की प्राचीनतम राजधानी माहिष्मती (आधुनिक महेश्वर) * थी, जिसकी स्थापना पौराणिक परम्परा के अनुसार हैहय राजा महिष्मन्त ने की थी। माहिष्मती के साथ आद्य कलचुरियों के सम्बन्ध की परम्परा बहुत बाद तक प्रचलित रही और इसका उल्लेख प्राचीन साहित्य एवं अभिलेखों में प्रायः आता है। राजशेखर ने अपने ग्रन्थ बालरामायण में इसे कलचुरियों की कुल-राजधानी कहा है। मुरारि कृत अनर्घराघव में माहिष्मती का निर्देश चेदिमण्डल की मुण्डमाला और कलचुरि कुल के राजाओं की सामान्य अग्रमहिषी कहकर किया गया है।" परवर्ती समय में कल्याणी के कलचुरियों ने चालुक्यों के सामन्त रूप में शासन किया। वे अभिमानपूर्वक स्वयं को माहिष्मतीपुरवरेश्वर कहते हैं।
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