ओ पिंजरे की मैना | कबीर की वाणी | Soulful Bhajan
Автор: Inquisitive Mind
Загружено: 2025-10-12
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“ओ पिंजरे की मैना, बोल हरि बैना, तुझे उड़ जाना है...”
यह गीत आत्मा की पुकार है — जो अपने तन रूपी पिंजरे से मुक्ति चाहती है।
पाँच तत्त्वों से बना यह शरीर, नव दरवाज़ों वाला पिंजरा है —
जहाँ मृत्यु नाम की बिलैया चौकन्नी बैठी है।
फिर भी मन मोह में अटका है, भूल गया कि यह ठिकाना बस कुछ रोज़ का है।
गीत की हर पंक्ति याद दिलाती है —
यह पिंजरा पुराना है, इसके तार ढीले हो चुके हैं,
कोई रोक नहीं सकेगा उस आत्मा को, जिसे अंततः उड़ जाना है।
भजन हृदय की गहराइयों से निकली वह सीख है —
कि बन्धन में प्रेम मत कर, भीतर हरि को पहचान।
यह आवाज़ एक गाँव के फकीर की तरह है,
जो खंजरी की थाप पर संसार को जगा रहा है –
“समझकर गाना है, ओ पिंजरे की मैना…”
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