जब मैं था तब हरि नहीं | Ego vs Reality | Kabir Bhajan | Bhajan 7
Автор: Cartoon Station | Bhajan Station
Загружено: 2026-03-01
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🙏 “जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाही…”
संत कबीर दास जी के इस गहरे दोहे पर आधारित यह भजन आज की दुनिया के अहंकार, तुलना और सोशल मीडिया की दौड़ को दर्शाता है।
जब इंसान “मैं” और अभिमान में खो जाता है, तब सच्ची शांति दूर हो जाती है।
यह गीत हमें सिखाता है कि जैसे ही अहंकार खत्म होता है, जीवन में प्रकाश और ईश्वर का अनुभव शुरू होता है।
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जय राम जी की 🙏
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