लिंगाष्टकम् स्तोत्रम् (भगवान शिव को प्रसन्न करने का सरल साधन- SUNO)
Автор: GEHE GEHE SANSKRITAM
Загружено: 2025-09-11
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लिंगाष्टकम् की रचना आदि शंकराचार्य, जिनको स्वयं भगवान शिव का अवतार माना जाता है, द्वारा की गई थी और इस काव्य की रचना भगवान शिव के लिंग रूप की स्तुति में प्रार्थना के रूप मे की गई है। इस प्रार्थना में भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, विनयशीलता, निष्ठा तथा भक्ति को प्रकट किया गया है। शिवलिंग शिव और शक्ति की शाश्वत लीला से उत्पन्न ब्रह्मांड का प्रतीकात्मक रूप है। शिव लिंगाष्टकम में भगवान शिव की महिमा और शिवलिंग की आराधना से होने वाले लाभों का वर्णन किया गया है।
लिंगाष्टकम भगवान शिव के बारे में आठ संस्कृत श्लोकों का एक अद्भुत संकलन है। वैज्ञानिक शोध से यह सिद्ध हो चुका है कि संस्कृत श्लोकों के उच्चारण से कंपनात्मक प्रभाव पड़ता है जिससे आंतरिक शांति, स्मृति और एकाग्रता में सुधार होता है। चूँकि संस्कृत एक प्राचीन, लयबद्ध और आध्यात्मिक भाषा है जो भारत में शिक्षा और धार्मिक दर्शन की प्राथमिक भाषा रही है, इसलिए श्लोक इसी भाषा में लिखे गए हैं।
यह सिद्ध हो चुका है कि संस्कृत मंत्रों के जाप से संज्ञानात्मक क्षमताएँ बढ़ती हैं, स्मरण शक्ति बढ़ती है, मन शांत होता है और स्पष्टता आती है। यह दर्शाने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन किए जा चुके हैं कि मंत्रोच्चार तनाव प्रबंधन और उपचार में कैसे मदद कर सकता है।
अष्टकम् संस्कृत भाषा में रची गई एक प्रकार की रचना को कहा जाता है जिसमें आठ छन्द होते हैं। प्राचीन युग के ऋषियों ने इस प्रकार की संगीतमय रचनाएँ अति लोकप्रिय हुआ करती थी। प्राचीन भारतीय साहित्य के इतिहास में अनेकों अष्टकम का मिलना इसी तथ्य को प्रमाणित करता है।
शिव लिंगाष्टकम, जो समूचे भारतवर्ष के मंदिरों और शिवालयों से गुंजायमान होता रहता है। अनगिनत लोग इस रचना की पवित्र ध्वनि को सुन कर जागते हैं जिसे उस क्षेत्र विशेष के सांस्कृतिक लोकाचार अनुसार मधुर धुन में लयबद्ध किया गया होता है।
ब्रह्म मुरारि सुरार्चित लिंगं निर्मल भासित शोभित लिंगम् । जन्मज दुःख विनाशक लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
देवमुनि प्रवरार्चित लिंगं काम दहं करुणाकर लिंगम् । रावणदर्प विनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
सर्व सुगंधि सुलेपित लिंगं बुद्धि विवर्धन कारणलिंगम् । सिद्ध सुरासुर वंदित लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
कनक महामणि भूषित लिंगं फणिप तिवेष्टित शोभितलिंगम् । दक्षसु यज्ञ विनाशनलिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
कुंकुम चंदनलेपित लिंगं पंकज हार सुशोभित लिंगम् । संचित पाप विनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
देव गणार्चित सेवितलिंगं भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम् । दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
अष्टदलोपरि वेष्ठित लिंगं सर्व समुद्भव कारणलिंगम् । अष्ट दरिद्र विनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगं सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम् । परात्परं परमात्मक लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिव सन्निधौ । शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥
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