श्रीदुर्गासप्तशती नवरात्र में व नित्यपाठ करने की सरल पूर्ण विधि ! पाठ सिद्ध,शाप उद्धार केसे होता हैं
Автор: सनातन धर्म के जीवन सूत्र (Shrividya Forest School)
Загружено: 2020-10-09
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श्री दुर्गा सप्तशती ( चंडीपाठ) को स्वयं करने के सभी नियम, अगर नवरात्र में सूतक या अशुद्धि लग जाएँ व संकल्प भी ले चुके हो तो क्या करना चाहिए , हिंदी और संस्कृत दोनों में केसे पाठ कर सकते हैं , पाठों को किस क्रम में करना हैं, कवच कीलक अर्गला और शाप का बंधन क्यों लगाया गया हैं, सभी कर सकें ऐसी शाप उद्धार व उत्कीलन की विधि , पाठ सिद्ध होना क्या होता हैं और केसे पता चलेगा की पाठ सिद्ध हो गया हैं , क्या गलती नहीं करनी हैं , पाठ करने में कोई दोष रह जाएँ या गलती हो , अशुद्ध उच्चारण हो तो क्या कुछ बुरा होता हैं ? ऐसे दोषों के लिए क्या करना चाहिए आदि आदि श्री दुर्गासप्तशती से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण जानकारी |
कई भक्तों के प्रश्न लगातार आ रहें कि पाठ किस क्रम में करना है और तीन चरित्र क्या है उनके लिए उत्तर -
श्रीदुर्गासप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है।
यह मुख्य रूप से तीन चरित्र में विभाजित हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम चरित्र (5-13 अध्याय)
पाठ का क्रम क्रमशः सभी अध्यायों को एक - एक करके एक साथ किसी एक दिन में (जैसे सप्तमी, अष्टमी, नवमी ) पढ़ना हो सकता हैं, नवरात्र में नित्य ही 13 अध्याय पढ़ना तो नौ दिन में नौ परायण अथवा एक दिन एक चरित्र को , अगले दिन दूसरे चरित्र को, तीसरे दिन तीसरा चरित्र पढ़ना हो सकता है इसे फिर दोहरा सकते हैं तो पूरे नवरात्र में दशमी तक आपके तीन परायण हो जाएंगे।
इतना पढ़ना भी सम्भव नहीं है तो आप पूरे नवरात्र में अपनी सुविधा अनुसार जब जितना पढ़ सके 13 अध्यायों को एक बार पढ़ लीजिए तो एक परायण हो जाएगा, बस ध्यान रखिये की किसी भी अध्याय को पूरा करने पर ही पाठ रोके और अध्याय के बीच में कुछ ना बोले।
प्रथम चरित्र की देवी महाकालीजी, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मीजी और उत्तम चरित्र की देवी महासरस्वतीजी मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकालीजी की स्तुति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मीजी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वतीजी की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है।
यह बात एक विचित्र सत्य को दर्शाती हैं की मनुष्य के लिए बल और धन की अपेक्षा ज्ञान की प्राप्ति अधिक कठिन हैं और इसके लिए ज्यादा साधना व परिश्रम करने की आवश्यकता हैं। ज्ञान जीवन के इन तीन आधारों में सबसे अधिक मजबूत व महत्वपूर्ण होना चाहिये।
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