"Ganeshwer Sabhyata-- पुरातत्व का पुष्कर
Автор: The History Gyan
Загружено: 2026-02-11
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नमस्ते दोस्तों! क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसी प्राचीन जगह है जिसे 'ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी' कहा जाता है? एक ऐसी जगह जहाँ के लोग हड़प्पा सभ्यता से भी पहले तांबे (Copper) का इस्तेमाल करने में माहिर थे? आज हम बात करेंगे राजस्थान की मिट्टी में दबी एक महान सभ्यता की— "गणेश्वर सभ्यता"।
गणेश्वर सभ्यता राजस्थान के सीकर जिले में कांतली नदी के किनारे बसी थी। इस ऐतिहासिक स्थल की खोज साल 1972 में रतनचंद्र अग्रवाल जी ने की थी। बाद में 1977 में रतनचंद्र अग्रवाल और विजय कुमार जी के नेतृत्व में यहाँ खुदाई यानी उत्खनन का कार्य किया गया। इसकी प्राचीनता और महत्व को देखते हुए इसे 'पुरातत्व का पुष्कर' भी कहा जाता है।
इस सभ्यता की सबसे हैरान कर देने वाली बात यहाँ से मिला तांबा है। यहाँ जो तांबा मिला, वह 99% शुद्ध था! यह इस बात का सबूत है कि यहाँ के लोग धातु विज्ञान (Metallurgy) में कितने आगे थे। माना जाता है कि ये लोग कच्चा तांबा पास की खेतड़ी (झुंझुनू) की खानों से प्राप्त करते थे और यहाँ से तांबा बनाकर अन्य प्राचीन सभ्यताओं को भेजते थे।
खुदाई के दौरान यहाँ से तांबे के कई औजार और उपकरण मिले हैं, जैसे:
तांबे के बाणाग्र (Arrowheads) और कुल्हाड़ी।
तांबे की अंगूठी और फरसा।
और सबसे दिलचस्प— मछली पकड़ने का कांटा।
इस कांटे के मिलने से इतिहासकार यह अंदाजा लगाते हैं कि उस समय कांतली नदी 'नित्यवाही' थी, यानी उसमें साल भर पानी रहता था और मछली पालन वहां के जीवन का हिस्सा था।
आमतौर पर पुरानी सभ्यताओं में ईंटों के घर मिलते हैं, लेकिन गणेश्वर के लोग पत्थर के मकानों में रहते थे। यहाँ तक कि यहाँ पत्थर के बांध (Dams) के साक्ष्य भी मिले हैं, जो शायद नदी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए थे।
यहाँ से विशेष प्रकार के मिट्टी के बर्तन मिले हैं जिन्हें 'कपीशवर्णी' मृदभांड कहा जाता है। ये बर्तन अक्सर काले और नीले रंग के होते थे, जो इस सभ्यता की एक अलग पहचान बताते हैं। दोस्तों, यह थी राजस्थान की वो सभ्यता जिसने भारत को तांबे के युग में एक नई पहचान दी। उम्मीद है आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। अगर आप ऐसे ही ऐतिहासिक वीडियो और देखना चाहते हैं, तो हमारे चैनल 'The History Gyan' को सब्सक्राइब जरूर करें।
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