।। रणभूत कौथिग अखोड़ी ग्यारह गांव टिहरी गढवाल ।। Ranbhuth Khothig Akhori
Автор: Jitendra Jitti Bhai Pahadi
Загружено: 2020-12-31
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#रणभूत_कोथिग
टिहरी जिले के भिलंगना विकासखंड के अखोड़ी गांव का रणभूत जागर एक ऐतिहासिक घटना से जुड़ा हुआ है. अखोड़ी गांव में सदियों पहले कुमाऊं की ओर से भंडारियों के आक्रमण में रात को सोए हुए नेगी योद्धा धोखे से मारे गए थे. इस आक्रमण में नेगी जाति की केवल एक गर्भवती महिला ढाल के नीचे सुरक्षित बच पाई थी.
आगे चलकर उसी की संतान से नेगी परिवार आगे बढ़ा. धोखे से मारे जाने के कारण नेगी योद्धाओं को उनकी पीढ़ियों द्वारा भूत रूप में पूजा और नचाया जाने लगा. हर तीसरे वर्ष नेगी जाति के परिवार रणभूत जागर का आयोजन करते हैं और अपने पूर्वजों को पूजते हैं. इस दैवीय अनुष्ठान में पहले तलवार और अन्य हथियारों की पूजा की जाती है. उसके बाद ढोल दमाऊ, नगा़ड़े और थाली की थाप और जागर के जरिये नेगी योद्धाओं को बुलाया जाता है जो कि नंगी तलवारों और ढाल के साथ युद्ध करते हुए अपनी वीरता को दिखाते हैं. इस दौरान महिलाएं भी इन योद्धाओं की पूजा करती हैं और इस अनुष्ठान में हिस्सा लेती हैं.
सालों पहले अपने पूर्वजों के बलिदान की गाथा को ढोल दमाऊ नगाड़े और थाली की थाप पर जागरों के माध्यम से त्रिवर्षीय अनुष्ठान की यह परम्परा लगातार चली आ रही है. इस अनुष्ठान के पीछे अपने अस्तित्व के लिए दो जाति समुदायों के बीच का खूनी संघर्ष दिखाया जाता है और नेगी योद्धाओं की वीरता को पूजा जाता है.
इतिहासकारों का मानना है कि उत्तराखंड के इतिहास में मध्यकाल में कई ऐसी शताब्दियां हैं, जहां इतिहास गीतों और जागरों में समाया हुआ है. इसका वर्णन इतिहास में तो नहीं मिलता, लेकिन जागर कथाओं में मिलता है. माना जाता है कि जो गर्भवती महिला बच गई थी उसी की संतानें आज की नेगी जाति के परिवार हैं.
उत्तराखंड के इतिहास में कई ऐसी महत्वपूर्ण अनोखी घटनाएं हैं जिनका वर्णन इतिहास में नहीं मिलता, लेकिन गीतों और जागर कथाओं के माध्यम से वो आज भी जीवित हैं. इसी वजह से उत्तराखंड में पांडव नृत्य, रामलीला और रणभूत जागर ऐसे दैवीय अनुष्ठानों का प्रचलन बदस्तूर जारी है जो कि हमें हमारे पूर्वजों के
जीवन और संघर्षों से हमें रूबरू कराता है।
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