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Автор: Vestige krishi gyan
Загружено: 2022-12-07
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यूरिया के दुष्प्रभाव
क्या यूरिया के दिन लद गए हैं? यह सवाल इसलिए क्योंकि जिस यूरिया ने कई गुणा पैदावार बढ़ाकर किसानों को गदगद किया, वही अब उन्हें खून के आंसू रुला रहा है। अब उपज कम हो रही है और जमीन के बंजर होने की शिकायतें भी बढ़ती जा रही हैं, इसलिए किसान यूरिया से तौबा करने लगे हैं। एक हालिया अध्ययन में पहली बार भारत में नाइट्रोजन की स्थिति का मूल्यांकन किया गया है जो बताता है कि यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल ने नाइट्रोजन चक्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। यह पर्यावरण और सेहत को भी नुकसान पहुंचा रहा है। अक्षित संगोमला और अनिल अश्विनी शर्मा ने यूरिया के तमाम पहलुओं की पड़ताल की
“इस बार तो हमने अपने एक एकड़ के खेत में चार-चार बार यूरिया डाला। आप मानिए कि 200 किलो से अधिक का यूरिया खेतों में डाल दिया, लेकिन उपज पिछले साल से भी कम ही मिल पाई। अब यह यूरिया हमारे लिए जी का जंजाल बन गया है। खेतों में डालो तो मुसीबत है और न डालने का तो अब सवाल ही नहीं पैदा होता।” बिहार के बेगुसराय जिले के बखरी गांव के 82 साल के किसान नंदन पोद्दार की इस उलझन का इलाज फिलहाल किसी के पास नहीं है। यूरिया उनके खेतों का वह जीवन बन गया है जिसकी फसल जहर के रूप में कट रही है।
देश को कृषि के क्षेत्र में मजबूत बनाने के उद्देश्य से यूरिया का इस्तेमाल हरित क्रांति (1965-66) के बाद पूरे देश में किया गया। पोद्दार कहते हैं, “शुरुआती सालों में देश के कई इलाकों में इस यूरिया के बारे में किसानों को विधिवत जानकारी नहीं दी गई। बल्कि रात में खेतों में यूरिया की बोरी चुपचाप डाल दी जाती थी, इससे भी जब बात नहीं बनी तब गांव के सरपंच के माध्यम से यूरिया किसानों को अपने-अपने खेतों में उपयोग करने के लिए आग्रह किया गया।” सभी किसानों से सरकार ने 1966-67 के दौरान यूरिया का इस्तेमाल करने की लगातार चिरौरी की। उन्होंने बताया कि हमें ऐसा लगा था कि खेती से होने वाला नुकसान यूरिया के उपयोग से मुनाफे में बदल जाएगा। हुआ भी ऐसा ही। पैदावार बढ़ने से हम खुश थे। हालांकि शुरू में हम डर भी रहे थे कि यूरिया के इस्तेमाल से कहीं हमारी फसल ही चौपट न हो जाए। हमने डरते-डरते पहली बार 1967 में एक एकड़ में केवल चार किलो यूरिया डाला। जब फसल तैयार हुई तो हमें अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ। क्योंकि पहली बार हम देख रहे थे कि गेहूं की उपज हमें तीन गुना अधिक मिली।
पोद्दार ने बताया कि पहले हम इतने ही खेत में गोबर की खाद डाल कर चार कुंतल (400 किलो ग्राम) उपज लेते थे। अब हम देख रहे थे कि सीधे 1200 किलो से अधिक गेहूं की उपज मिली। हम सभी को यकीन नहीं हुआ कि यह कौन सा चमत्कार है। मेरे खेतों में बढ़ी पैदावार को देख गांव के अन्य किसानों ने भी अगले साल यानी 1968 में अपने-अपने खेतों में सहकारी समितियों से मिलने वाला यूरिया डाला और वे भी अपनी-अपनी फसल देखकर गदगद थे। आखिर तीन गुना ज्यादा फसल पाकर कौन किसान होगा जो खुशी से फूला नहीं समाएगा। देखते ही देखते यूरिया खेतों का नायक बन चुका था।
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