श्री अपराजिता योगिनी स्तोत्र | लेखरंजन कृत स्तोत्र | ध्यान, विनियोग, न्यास सहित पूर्ण पाठ
Автор: उद्दंड मार्तंड 𝑼𝒅𝒅𝒂𝒏𝒅 𝑴𝒂𝒓𝒕𝒂𝒏𝒅
Загружено: 2026-03-02
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॥ जय माँ अपराजिता योगिनी ॥
इस दिव्य वीडियो में प्रस्तुत है श्री अपराजिता योगिनी स्तोत्र, जिसमें सम्मिलित हैं —
🔹 ध्यान
🔹 विनियोग
🔹 करन्यास
🔹 अंगन्यास
🔹 स्तोत्र पाठ
🔹 फलश्रुति
माँ अपराजिता योगिनी की कृपा से साधक को विजय, आरोग्य, ऐश्वर्य और आध्यात्मिक सिद्धि की प्राप्ति होती है।
यह स्तोत्र नित्य पाठ, नवरात्रि, विशेष साधना एवं शक्ति उपासना के लिए अत्यंत प्रभावशाली है।
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जय माँ अपराजिता।
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॥ श्रीअपराजिता-योगिनी-स्तोत्रम् ॥
ध्यानम्
सिंहासीनां रक्तवर्णां त्रिनेत्रां चन्द्रशेखराम्।
खड्ग-चक्र-वराभीति-धारिणीं करपङ्कजैः॥
मुक्ताहार-किरीटाढ्यां दिव्याभरण-भूषिताम्।
अपराजितां योगिनीं ध्यायेद् भक्त्या समाहितः॥
विनियोगः
अस्य श्रीअपराजिता-योगिनी-स्तोत्रस्य लेखरंजन-प्रणीतस्य।
अनुष्टुप् छन्दः। श्रीअपराजिता योगिनी देवता।
मम सर्वविघ्न-शत्रु-भय-नाशन-आयुरारोग्य-ऐश्वर्य-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः॥
करन्यासः
ॐ अपराजितायै अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ विजयायै तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ जयप्रदायै मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ भद्रायै अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ शक्त्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ सर्वसिद्धिदायै करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः॥
अङ्गन्यासः
ॐ अपराजितायै हृदयाय नमः।
ॐ विजयायै शिरसे स्वाहा।
ॐ जयप्रदायै शिखायै वषट्।
ॐ भद्रायै कवचाय हुं।
ॐ शक्त्यै नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ सर्वसिद्धिदायै अस्त्राय फट्॥
स्तोत्रम्
नमो देव्यै महादेव्यै अपराजितायै नमो नमः।
योगिनीं योगमायां तां भजेऽहं शरणं गतः॥
त्रैलोक्य-विजयां देवीं दुष्टसंहार-कारिणीम्।
लेखरंजन-वन्दितां तां प्रणमामि पुनः पुनः॥
भक्तानां वरदां नित्यां सर्वसिद्धि-प्रदायिनीम्।
अभयां करुणार्द्रां तां नमामि जगदम्बिकाम्॥
या शक्तिः सर्वभूतेषु चेतनारूपेण संस्थिता।
तस्यै नमो नमस्तुभ्यं अपराजिते नमोऽस्तु ते॥
खड्गेन छिन्धि मे पापं चक्रेण विघ्नमर्दय।
वरदाभयदायिन्यै नमस्ते विजयेश्वरि॥
दुःख-दावानल-तप्तान् शरणागत-वत्सला।
उद्धरस्व जगन्मातः त्वमेव शरणं मम॥
आयुरारोग्यमैश्वर्यं पुत्रपौत्रादि-संपदः।
देहि मे योगिनि नित्यं त्वत्पादार्चन-तत्परम्॥
इति स्तुत्वा महादेवीं लेखरंजन-कीर्तिताम्।
लभते परमां सिद्धिं नात्र कार्या विचारणा॥
फलश्रुतिः
यः पठेत् प्रातरुत्थाय श्रद्धाभक्ति-समन्वितः।
तस्य विघ्नाः प्रणश्यन्ति रोगाः शान्तिं प्रयान्ति च॥
शत्रवो विनश्यन्त्याशु सौख्यं भवति सर्वदा।
धन-धान्य-समृद्धिः स्यात् सन्ततिः शुभदा भवेत्॥
अपराजिता-प्रसादेन जयः सर्वत्र जायते।
अन्ते मोक्षं लभेद् धीरः देवी-सायुज्यमाप्नुयात्॥
॥ इति श्रीलेखरंजन-प्रणीतं श्रीअपराजिता-योगिनी-स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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🔱 श्री अपराजिता योगिनी स्तोत्र पाठ विधि 🔱
नीचे सरल एवं शास्त्रीय क्रम से पाठ-विधि दी जा रही है —
१️⃣ शुद्धि एवं तैयारी
प्रातः ब्रह्ममुहूर्त या संध्या समय स्नान करें।
पीले, केसरिया या स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करें।
माँ अपराजिता का चित्र या दीपक स्थापित करें।
घी का दीपक एवं धूप प्रज्वलित करें।
२️⃣ संकल्प
दाहिने हाथ में जल लेकर मन में संकल्प करें —
“मैं (अपना नाम) श्री अपराजिता योगिनी की कृपा प्राप्ति, विघ्न नाश एवं सिद्धि हेतु स्तोत्र पाठ कर रहा/रही हूँ।”
जल पृथ्वी पर छोड़ दें।
३️⃣ ध्यान
नेत्र बंद कर देवी का ध्यान करें —
सफेद वस्त्रधारिणी, दिव्य आभा से युक्त, नील मयूर पर विराजमान, करुणामयी अपराजिता योगिनी का स्मरण करें।
कम से कम 1–3 मिनट ध्यान करें।
४️⃣ विनियोग
स्तोत्र का विनियोग शुद्ध उच्चारण से करें।
५️⃣ करन्यास एवं अंगन्यास
दिये गये मंत्रों से क्रमशः करन्यास एवं अंगन्यास करें।
यह साधना को शक्तिशाली बनाता है और आंतरिक शुद्धि करता है।
६️⃣ मूल स्तोत्र पाठ
श्रद्धा एवं स्पष्ट उच्चारण से सम्पूर्ण स्तोत्र का पाठ करें।
सामान्य साधक 1 बार पाठ करें।
विशेष साधना हेतु 11, 21 या 108 बार पाठ किया जा सकता है।
७️⃣ फलश्रुति पाठ
अंत में फलश्रुति अवश्य पढ़ें।
८️⃣ प्रार्थना एवं क्षमा याचना
“हे माँ अपराजिता, यदि पाठ में कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करें और अपनी कृपा बनाए रखें।”
📿 विशेष नियम
नवरात्रि में प्रतिदिन पाठ अत्यंत शुभ।
बुधवार या शुक्रवार से आरम्भ करना उत्तम।
11 दिन निरंतर पाठ करने से विशेष मनोकामना सिद्ध होती है।
शुद्धता, सात्त्विक आहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन लाभकारी।
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