8.11.1981 avyakt mahavakya/"अन्तर सम्पन्न करने का साधन - ‘तुरन्त दान महापुण्य"/in sindhi
Автор: avyakt mahavakya in sindhi brahma kumaris
Загружено: 2026-01-08
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🌟''आज बापदादा सवेरे प्रात:काल बाप बच्चों की माला स्मरण करते। कौन-सी माला? गुण माला।👉 कोई बच्चे इतनी मालाओं से सजे हुए थे जैसे मालायें उनकी ड्रेस बन गई थी।
👉ब्रह्मा बाप वैरायटी गुण-मालाओं से सजे हुए बच्चों को देख-देख हर्षित हो रहे थे।👉वैरायटी रूप रेखा और रंग वाले थे। विशेष चार प्रकार के रंग थे। जिसमें मुख्य चार सब्जेक्टस के चार रंग थे।ज्ञान-योग-धारणा और सेवा
✨️ज्ञान स्वरूप की निशानी कौन-सा रंग होगा? गोल्डन कलर जो हल्का-सा गोल्ड कलर होने के कारण उस एक ही हीरे से सर्व रंग दिखाई देते थे। जैसे चमक रहा है। और यह उससे भी सुन्दर सूर्य। क्योंकि सर्व रंगो की किरणें दूर से ही स्पष्ट दिखाई देती थीं। चित्र सामने आ रहा है ना! कैसे चमक रहा है हीरा?
✨️याद की निशानी - यह तो सहज है ना? याद में यहाँ भी बैठते हो तो क्या करते हो? लाल रंग। लेकिन इस लाल रंग में भी गोल्डन रंग मिक्स था, इसलिए आपकी इस दुनिया में वह रंग नहीं है। कहने में तो लाल रंग आयेगा।
✨️धारणा की निशानी सफेद रंग। लेकिन सफेदी में भी जैसे चन्द्रमा की लाईट के बीच सुनहरी रंग मिक्स करो या चाँदनी के रंग में हल्का-सा पीला रंग एड करो तो दिखाई चांदनी जैसा देगा लेकिन हल्का सा सुनहरी होने के कारण उसकी चमक और ही सुन्दर हो जाती है। यहाँ वह रंग बना नहीं सकेंगे। क्योंकि वे चमकने वाले रंग हैं। कितनी भी ट्रायल करो लेकिन वतन के रंग यहाँ कहाँ से आयेंगे?
🌟सेवा की निशानी हरा रंग। सेवा में चारों ओर हरियाली कर देते हो ना! कांटो के जंगल को फूलों का बगीचा बना देते हो।
👉तो अभी सुना चार रंग कौन से हैं? इन चार रंगो के हीरों से सजी हुई मालायें सबके गले में थीं। इसमें भिन्न-भिन्न साइज और चमक में अन्तर था।👉तो बापदादा सबकी रिजल्ट मालाओं के रूप में देख रहे थे।👉दूर से हीरे ऐसे चमक रहे थे जैसे छोटे-छोटे बल्बों की लाइन-यह था चित्र।👉 ‘‘समय की रफ्तार प्रमाण सर्व बच्चों का श्रृंगार सम्पन्न हुआ है?'' क्योंकि रिजल्ट में तो अन्तर था। तो इस अन्तर को सम्पन्न कैसे करें?
🌟अब इस चित्रों द्वारा रिजल्ट देख ब्रह्मा बाप बोले - ‘‘समय की रफ्तार प्रमाण सर्व बच्चों का श्रृंगार सम्पन्न हुआ है?'' क्योंकि रिजल्ट में तो अन्तर था। तो इस अन्तर को सम्पन्न कैसे करें?👉 बाप तो सजा भी दें लेकिन धारण करने की समर्था भी चाहिए! सम्भालने की समर्था भी चाहिए।👉कारण क्या निकला?सोचते सब हैं,करते भी सब हैं लेकिन कोई- कोई हैं जो सोचते और करते एक ही समय पर हैं। अर्थात् सोचना और करना साथ-साथ है,वह सम्पन्न बन जाते हैं और कोई-कोई हैं जो सोचते हैं और करते भी हैं लेकिन सोचने और करने के बीच में मार्जिन रह जाती है। सोचते बहुत अच्छा हैं लेकिन करते कुछ समय के बाद हैं। उसी समय नहीं करते हैं। इसलिए संकल्प मे जो उस समय की तीव्रता, उमंग-उल्लास-उत्साह होता है वह समय पड़ने से परसेन्टेज कम हो जाती है।👉उसकी रिजल्ट में अन्तर पड़ जाता है। बीच में समय की मार्जिन होने के कारण, एक तो सुनाया कि परसेन्टेज सब की कम हो जाती है। दूसरा - मार्जिन होने के कारण समस्याओं रूपी विघ्न भी आ जाते हैं।👉इसलिए सोचना और करना साथ-साथ हो। इसको कहा जाता है - ‘‘तुरन्त दान महापुण्य।'' नहीं तो महापुण्य के बजाए पुण्य हो जाता है। तो प्राप्ति में अन्तर हो जाता है। समझा कारण क्या है? छोटा सा कारण है। 👉तो ब्रह्मा बाप बच्चों से बोले - ‘‘अब इस कारण का निवारण करो।'' 👉निवारण करना ही नव-निर्वाण करना हो जायेगा। 🌟ऐसे सदा सजे-सजाये, सोचना और करना समान बनाने वाले, सदा बाप समान तुरन्त दानी महापुण्य-आत्मायें, दोनों बाप के शुभ इच्छा को पूर्ण करने वाले, ऐसे सम्पन्न आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’
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