New Launch: प्राणधन जीवन कुंज बिहारी भावपूर्ण गायन
Автор: Jagadguru Kripalu Ji Community
Загружено: 2026-02-09
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प्रेम का स्वरूप भक्ति चैलेंज 69 (8 -18 फरवरी)
—प्रेम रस मदिरा, पद संख्या 3.64, सिद्धांत माधुरी—
प्राणधन जीवन कुंज बिहारी।
तुम तो रहे सनातन हमरे, हौं हूँ रही तिहारी।
उर लगाय भुज भरि हरि चाहे, पुरवहु आस हमारी।
चाहे मोहिँ तड़पाउ मोरि मुख, पग ठुकराव मुरारी।
जेहि विधि पिवु सुख पाउ करिय सोइ, मो कहँ सोइ सुख भारी।
यह 'कृपालु' है रीति प्रीति की, निज सुख चह व्यापारी॥
—पद संख्या 4.4, दैन्य माधुरी—
अहो पिय! जब तुम्हरी बनि जैहौं।
तव मुखचंद्र, चकोर पियत नित, दृगन न नेकु अघैहौं।
ह्वै तुम्हरी अपनो करि तुम को, तन मन प्राण लुटैहौं।
तव कर परस पाय मदमाती, फूली अँग न समैहौं।
नचिहौं बनि उनमादिनि छिन छिन, तुम्हरोइ गुनगन गैहौं।
मन भाई ‘कृपालु' करि भुज भरि, पुनि पुनि कंठ लगैहौं॥
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