तंवरावाटी और पाटन राज्य के तंवर/तोमर राजपूतों का इतिहास।। History of Tanwar Rajput of Patan Riyasat
Автор: Times Of Rajasthan
Загружено: 2021-07-28
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तंवरावाटी (तोरांवटी) तथा पाटन राज्य के तंवर (तोमर) राजपूतों का इतिहास
जयपुर और सीकर के आस-पास का क्षेत्र, जिसे आजकल तोंरावाटी अथवा तंवरावाटी के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र की राजधानी पाटन रही है। तोंरावाटी, संस्कृत के 'तोमर' शब्द से उत्पन्न 'तँवर' या 'तुंवर' राजपूतों के आधिपत्य के कारण 'तोंरावाटी' पड़ा हैं। इस क्षेत्र पर तोमरवंशी राजपूतों का शासन रहा हैं इसलिए इसे तोमरवाटी' कहा जाने लगा, जो लोकभाषा में तोरावाटी अथवा अब तंवरावाटी कहलाने लगा हैं। राजस्थान में ऐसे अनेक क्षेत्र है जिनके नाम आज भी उस क्षेत्र पर शासन करने वाली जाति विशेष के नाम से जाने जाते है जैसे मांगलियावाटी जहां गुहिलोत मांगलियों का निवास क्षेत्र रहा है, बीकानेर की स्थापना से पूर्व उसके आस-पास का क्षेत्र जोहियावाटी कहलाता था जो जोहिया राजपूतो के कारण पड़ा, इसी प्रकार राव शेखाजी के वंशजो को शेखावत कहते है और उनका ठिकाना आज भी शेखावाटी कहा जाता है। इसी कड़ी में तोमरवंशी राजपूतों का ठिकाना ‘तोंरावाटी' के नाम से विख्यात हैं।
तंवरावाटी और पाटन के तंवर राजपूतों का सीधा-संबंध पांडू पुत्र अर्जुन के वंशज दिल्लीपति सम्राट अनंगपाल तोमर से है। अनंगपाल द्वितीय ने अपने दो पुत्र अमजी और सलूण (शलिवाहन) को जयपुर के आस-पास के इस वर्तमान तोंरावाटी क्षेत्र में स्थापित किया था। इनसे पूर्व भी दिल्ली के तोमर राज्य की सीमाएं इस क्षेत्र तक फैली हुई थी। कालान्तर में इस क्षेत्र तक दिल्ली की सीमाएं सुरक्षित करने के उद्देश्य से इन दोनों राजकुमारों को इस क्षेत्र में स्थापित किया गया था। सलून ने 1088 ई. में अचलगढ़ के किले को फतह किया था। इसके पश्चात् उन्होंने नारनौल गांव से लेकर नीमकाथाना और कोटपूतली तक सांखला राजपूतों के 32 गांवों पर अधिकार किया था, यह 32 गांव पहले सांखला पंवार राजपूतों के अधिकार में थे और सांखला राजपूत बेवा को अपनी राजधानी बनाकर रह रहे थे, परंतु महाराज अनंगपाल तोमर के बहादुर पुत्रों ने 'बेवा' के सांखलों से युद्ध करके उन्हें पराजित कर बेवा पर अधिकार कर लिया। सलूण के बड़े भाई अमजी ने थोड़ा आगे बढ़कर नरेणा पर अधिकार कर लिया और कालान्तर में अमजी के वंशज अजमालजी हुए। जिनके वीर पुरुष रामदेवजी हुए जिन्होंने रामदेवरा में अपनी राजधानी स्थापित की।
सलून(शालिवाहन) तोमर ने अपने बाहुबल से आस-पास के बड़े भू-भाग पर अधिकार कर एक सुदृढ़ राज्य की स्थापना करना प्रारम्भ किया। सलून जी के निहालसिंह पुत्र हुए। जिन्होंने पाटन के नजदीक नरहर को 1109 ई. में जीता था । इसके बाद 1110 ई. में निहालसिंह के पुत्र राजा दोहथा ने पाटन के पास ही तोंदा को जीत कर अचलगढ़ की सीमा में मिला लिया था। राजा दोहथा के तीन पुत्र हुए- हरमन, जैरथ और पोपट ।
राजा दोहथा के द्वितीय पुत्र जैरथ बड़े वीर पुरुष हुए, उनके शरीर पर घने (अत्यधिक) बाल होने के कारण उन्हें जटमल कहा जाने लगा। कालानन्तर में इन्हीं जटमल के वंशजों को जाटू तोमर कहा जाने लगा। इनके वंशज हरियाणा के रोहतक, भिवानी, सिरसा, महेन्द्रगढ़, गुड़गांव आदि के 1440 गांवों में बसते हैं।
इनके बड़े भाई हमरनजी ने पिता से आज्ञा प्राप्त कर धौलपुर व उसके आस-पास के क्षेत्र पर अधिकार करने हेतु चले गये। राजा दोहथा तोमर के देहान्त के पश्चात् तृतीय पुत्र पोपटराज जी तोमर उनके उत्तराधिकारी बने। राजा पोपटराज तोमर वीर व साहसी राजा हुए इन्होंने अपने राज्य को सुरक्षित करने हेतु सन् 1135 ई. में 'पपरूना' नामक गांव की नींव रखी। राजा पोपटराज की मृत्यु के पश्चात उनके उत्तराधिकारी राजा पीपलराज तोमर ने 1156 ई. में पाटन के बाहू सांखला को युद्ध में पराजित कर पाटन को जीत लिया था। उसके पश्चात् 'बिहार' के भीम सांखला को युद्ध में पराजित कर उससे बिहार छीन लिया था। आस-पास के सभी क्षेत्रों को मिलाकर राजा पीपलराज ने पाटन को तोमर राज्य की राजधानी का गौरव प्रदान किया।
राजा पीपलराज के समकालीन दिल्ली में शक्तिशाली तोमर शासक मदनपाल राज्य कर रहे थे। मदनपाल उस समय उत्तरी भारत के एक शक्तिशाली राजा थे। पाटन के तोमर दिल्ली के तोमरों की ही शाखा थी। राजा पीपलराज के चार पुत्र हुए - आसल जी (अलसी) कोनसी जी, पालन जी और भैरूजी । राजा पीपलराज की मृत्यु के पश्चात् आसल जी पाटन की राजगद्दी पर बैठे |
आसलजी तोमर ने राजगद्दी पर बैठते ही अपनी शक्ति और राज्य का विस्तार करना आरंभ कर दिया और इन्होंने राणा का विरूद धारण किया जो बड़ी उपलब्धि का द्योतक हैं। राणा आसलजी तोमर के समकालीन अजमेर के पृथ्वीराज चौहान थे। पाटन के राणा आसलजी तोमर ने तुर्कों के विरुद्ध दिल्ली के राजाओं का साथ दिया था और तराईन की दोनों युद्धों में राणा आसल और पाटन के तोमरों ने भाग लिया था।राणा आसल के बाद क्रमश: कंवरसी (कमल), महीपाल, भूपाल, बच्छराज, बहादड़ और बहादुरसिंह तोमर पाटन के राणा हुए।
राणा बहादुरसिंह की चौदह रानियों से 32 पुत्र हुए। इन बत्तीस पुत्रों को आजीविका हेतु बत्तीस गांव दिए गए जिससे यह क्षेत्र बत्तीसी के नाम से पहचाना जाने लगा। राणा बहादुरसिंह के पश्चात् क्रमश: पिरथीराज (पृथ्वीराज) राणा कल्याण, कुम्भा, भेरसी (बहरसी) और राणा जगमाल पाटन की गद्दी पर बैठे । राणा जगमाल के 8 पुत्र हुए। जिनमें बड़े पुत्र पूर्णमल राणा बने, उनके पश्चात् लाखन और लूणकर्ण हुए। राणा लूणकर्ण के 11 पुत्रों में से 8 पुत्र जीवित रहे, जिनसे तंवर राजपूतों के 'आठ थांबे' प्रारम्भ हुए। राणा लूणकर्ण के पश्चात् उनके पुत्र राणा कंवल जी तोमर पाटन की गद्दी पर बैठे।
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