जय जय जय.. साधर्मी वात्सल्य एवं भक्ति भजन | दिगंबर जैन
Автор: Achyut Kant Shastri
Загружено: 2026-02-05
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"जब ढोल पर डंका पड़ता है, तो केवल शोर नहीं होता, बल्कि भक्ति की हुंकार गूँजती है। जब एक साधर्मी भाई दूसरे के द्वार पर आता है, तो वह केवल मेहमान नहीं, बल्कि साक्षात वात्सल्य का रूप होता है। आदिपुराण की मर्यादा और 13 पंथ आम्नाय के सिद्धांतों को संजोए हुए यह भजन हमें याद दिलाता है कि हमारा असली गंतव्य क्या है— 'मोक्ष मार्ग में जाना है'। आइए, इस संगीतमय उत्सव में डूबकर अपनी आत्मा को निज स्वरूप से जोड़ें।"
लेखक - अनाकुल जैन (तीर्थधाम मंगलायतन)
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