क्या आचार्य देवव्रत जी की मौत के करीब से वापसी एक चमत्कार थी?
Автор: ऋषि Drishti
Загружено: 2026-01-17
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आचार्य देवव्रत के जीवन का अनसुना सच: जब मौत के करीब से लौट आए
2:27 दैनिकचर्या
5:23 बीमारी और बिगड़ते हालात
7:55 बिगड़ते हालातों में लगा कि विदाई निश्चित है
9:50 स्वामी जगदीश्वरानंद जी की मुलाकात एक उम्मीद की किरण बनी
13:45 मन में छाई निराशा के बादल
15:10 बेटा तू बड़ा कीमती है....स्वामी जी की ये शब्द और स्वामी जी मेरा मनोबल बने।
20:04 और मैं ठीक हो गया
22:00 मैं परहेज करता गया मेरा वजन बढ़ता गया लोगों को यकीन नहीं हुआ ,,,लेकिन स्वामी जी ने कहा कि मैं आपकी जिंदगी में 10 साल और अधिक जोड़ दिए खुल के जियो
25:20 अब की बारी मेरी स्वामी जी के ऋण से उऋण होने की फिर क्या था मैं भी प्राकृतिक चिकित्सा दुनिया तक पहुंचाने की ठान ली
28:06 अल्सराइटिस जिसका आज भी दुनिया में इलाज नहीं मैंने उसे बिना किसी दवाई के सिर्फ खानपान से ठीक कर लिया।
आचार्य देवव्रत (गुजरात के राज्यपाल) आज प्राकृतिक खेती और आयुर्वेद के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते हैं। उनके इस अटूट विश्वास के पीछे उनके जीवन की एक ऐसी घटना है, जिसने उन्हें मौत के मुँह से बाहर निकाला था।
जीवन और मृत्यु का वह संघर्ष
आचार्य देवव्रत बताते हैं कि उनके युवावस्था के दिनों में एक समय ऐसा आया जब उनका स्वास्थ्य पूरी तरह गिर गया था। उन्हें पेट और पाचन तंत्र से जुड़ी बेहद गंभीर बीमारी ने घेर लिया था।
निराशा का दौर: उन्होंने देश के कई बड़े अस्पतालों और डॉक्टरों से इलाज करवाया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई थी कि उनका शरीर पूरी तरह सूख चुका था और डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे।
परिवार की हताशा: उनके परिवार ने उनकी जीवन की आस छोड़ दी थी। खुद आचार्य जी को भी लगने लगा था कि अब उनके पास अधिक समय नहीं बचा है।
आयुर्वेद का सहारा: जब आधुनिक चिकित्सा (Allopathy) ने जवाब दे दिया, तब उन्होंने पूर्णतः आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy) की शरण ली।
प्राकृतिक चिकित्सा से कायाकल्प
उन्होंने एक कठोर अनुशासन का पालन किया, जिसमें शामिल था:
पंचकर्म और शुद्धि: शरीर के भीतर जमा विषाक्त पदार्थों (Toxins) को बाहर निकाला गया।
सात्विक आहार: रासायनिक खाद से उगे अनाज को छोड़कर पूरी तरह प्राकृतिक भोजन अपनाया।
योग और प्राणायाम: प्राण वायु के माध्यम से फेफड़ों और रक्त को शुद्ध किया।
परिणाम: जिस शरीर को डॉक्टरों ने लाइलाज घोषित कर दिया था, वह कुछ ही महीनों में न केवल स्वस्थ हुआ, बल्कि पहले से अधिक ऊर्जावान हो गया। उन्होंने महसूस किया कि "भोजन ही औषधि है।"
इस घटना का उनके मिशन पर प्रभाव
इसी अनुभव ने उनके जीवन का उद्देश्य बदल दिया। आज वे जो अभियान चला रहे हैं, उसके पीछे यही सच्चाई है:
गौ सेवा: उन्होंने देशी गाय के महत्व को आयुर्वेद से जोड़ा, क्योंकि उनके उपचार में गौ-उत्पादों का बड़ा योगदान था।
"मेरा पुनर्जन्म आयुर्वेद और प्रकृति की गोद में हुआ है, इसलिए मेरा शेष जीवन प्रकृति और ऋषियों की इस विद्या को समर्पित है।" — आचार्य देवव्रत
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