श्री शिव रुद्राष्टकम (Shiva Rudrashtakam)
Автор: brhmand 🇮🇳
Загружено: 2026-02-08
Просмотров: 72
Описание:
🔱 श्री शिव रुद्राष्टकम (Shiva Rudrashtakam)
AI Generated
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्॥
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥ १॥
(हे मोक्ष स्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेद स्वरूप ईशान दिशा के ईश्वर और सबके स्वामी श्री शिवजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निज स्वरूप में स्थित, भेदरहित, इच्छा रहित, चेतन आकाश रूप आकाश को ही वस्त्र के रूप में धारण करने वाले दिगम्बर आपको मैं भजता हूँ।)
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्॥
करालं महाकालकालं कृपालं। गुणागारसंसारपारं नतोऽहम्॥ २॥
(निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम और संसार के पार ले जाने वाले भगवान आपको मैं नमस्कार करता हूँ।)
तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं। मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम्॥
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥ ३॥
(जो हिमालय के समान गौरवर्ण और गहरे हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति और शोभा है, जिनके मस्तक पर गंगाजी लहरा रही हैं, भाल (ललाट) पर बाल चंद्रमा सुशोभित है और गले में सर्पों की माला है।)
चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥ ४॥
(जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भृकुटी और विशाल नेत्र हैं, जिनका मुख प्रसन्न और कण्ठ नील है और जो दयालु हैं। जो सिंहचर्म धारण किए हुए और मुण्डमाल पहने हैं, उन सबके प्यारे और सबके नाथ श्री शंकर को मैं भजता हूँ।)
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्॥
त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥ ५॥
(प्रचण्ड, श्रेष्ठ, प्रगल्भ, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दुखों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए हुए, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकर को मैं भजता हूँ।)
कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥ ६॥
(कलामय, कल्याण स्वरूप, कल्प का अंत करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुरासुर के शत्रु, चिदानन्द घन, मोह को हरने वाले और कामदेव के शत्रु हे प्रभु! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए।)
न यावद् उमानाथपादारविन्दं। भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्॥
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥ ७॥
(जब तक मनुष्य पार्वती के पति के चरण कमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इस लोक में और न ही परलोक में सुख-शान्ति मिलती है और न ही उनके तापों का नाश होता है। अतः हे समस्त जीवों के हृदय में निवास करने वाले प्रभु! प्रसन्न होइए।)
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्॥
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥ ८॥
(मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न ही पूजा। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। बुढ़ापा और जन्म के दुखों से जलते हुए मुझ दुखी की रक्षा कीजिए। हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।)
Повторяем попытку...
Доступные форматы для скачивания:
Скачать видео
-
Информация по загрузке: