🧘🧘 संपूर्ण कर्मातीत स्टेज द्वारा सिद्धि स्वरूप बने
Автор: Ruhani sair
Загружено: 2026-02-12
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🧘 राजयोग मेडिटेशन कमेंट्री यहाँ प्रस्तुत है।
आज के वरदान पर आधारित अभ्यास
13-02-2026
सम्पूर्ण कर्मातीत स्टेज द्वारा सिद्धि स्वरूप बनो
गहराई से तीन बार श्वास लें... और धीरे-धीरे छोड़ें...
चारों ओर के शोर-गुल से अपने मन को हटा लें...।
अब देखें... इस स्थूल शरीर से अलग... मैं एक दिव्य चमकता हुआ सितारा हूँ...।
महसूस करें... यह शरीर मिट्टी का पुतला है, और मैं इसमें रहने वाली चैतन्य शक्ति आत्मा हूँ...।
धीरे-धीरे मैं इस पांच तत्वों की देह से न्यारी हो रही हूँ...
मेरे अंग-अंग से प्रकाश निकल रहा है...
मैं डबल लाइट फरिश्ता स्वरूप का अनुभव कर रहा हूँ...।
इस देह और साकारी वतन को छोड़...
उड़ चलें... सूरज, चाँद, तारों से पार... अपने मीठे घर, परमधाम की ओर...।
परमधाम की लाल सुनहरी दुनिया में... शिवबाबा के सम्मुख...
मैं आत्मा पूरी तरह से बंधन मुक्त अवस्था में हूँ...।
न कर्म का बंधन..., न देह का आकर्षण..., न कोई व्यर्थ संकल्प...।
मैं सम्पूर्ण कर्मातीत हूँ... उपराम हूँ...।
बापदादा की सर्व शक्तियों की किरणें ...मुझ पर बरस रही हैं...।
मेरा रोम-रोम शक्ति से भर रहा है...।
मैं बापदादा के साथ कंबाइंड हूँ...
महसूस करें... मेरी बुद्धि रूपी पात्र (Vessel) एकदम स्वच्छ और विशाल होती जा रही है...।
इसमें कोई पुरानी बातें..., किसी की कमी-कमजोरी नहीं है...।
मेरी पवित्र बुद्धि में... परमात्मा की दी हुई ... सर्व सिद्धियाँ समा रही हैं...।
मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ...।
मेरे संकल्प में इतनी शक्ति है कि... मैं जो सोचता हूँ, वह सिद्ध हो जाता है...।
असंभव शब्द मेरी डिक्शनरी में नहीं है...।
मैं सिद्धि स्वरूप हूँ...।
अब देखें... नीचे सारी दुनिया को...।
समय बदल रहा है... स्थूल साधन कम हो रहे हैं...।
लेकिन मैं अपनी साधना के बल से सेवा कर रहा हूँ...।
मैं एक जगह स्थित हूँ... लेकिन मेरा मन विश्व कल्याण के कार्य में लगा हुआ है...।
मेरी शुभ भावना और शुभ कामना की शक्तिशाली तरंगें... (Vibrations)...
दुनिया के कोने-कोने में पहुँच रही हैं...।
जहाँ वाणी नहीं पहुँच सकती... वहाँ मेरा वाइब्रेशन काम कर रहा है...।
मैं प्रकृति को सतोप्रधान बना रहा हूँ...
आत्माओं को शांति का दान दे रहा हूँ...।
मैं स्वयं को चेक करता हूँ... क्या मेरे में कोई अलबेलापन है? नहीं...।
मैं एवररेडी हूँ...।
चाहे आज ही अंतिम घड़ी आ जाए... मैं तैयार हूँ...।
हर कर्म करते हुए... मैं न्यारा और प्यारा हूँ...।
हाथ कर्म में हैं... लेकिन बुद्धि बाप के साथ है...।
अभी-अभी कर्मयोगी... और एक सेकंड में कर्मातीत स्थिति...।
यही मेरा अभ्यास है...।
मैं विश्व परिवर्तन की आधारमूर्त ...और जिम्मेवार आत्मा हूँ...।
सफलता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है...।
कुछ पल इस महान स्थिति में रहें...
मैं सिद्धि स्वरूप आत्मा हूँ...
मैं सम्पूर्ण कर्मातीत हूँ...
मैं विश्व का आधार मूर्त हूँ...।
इसी स्वरूप में खुद को देखते जाए... और मग्न रहे...
ॐ शान्ति... शान्ति... शान्ति...
ईश्वरीय सेवा में,
बी के अशोक भाई,
वृति प्रोजेक्ट
ज्ञानामृत प्रिटिंग प्रेस, शांतिवन
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