Padratnakar-613, पद-रत्नाकर पदसंख्या-६१३, तुमसे सदा लिया ही मैनें
Автор: Padratnakar prachar evam shodh sansthan
Загружено: 2023-10-10
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श्रीराधाके प्रेमोद्गार श्रीकृष्णके प्रति
हे प्राणेश्वर ! तुमसे मैंने सदा लिया- ही-लिया है, लेती-लेती मैं किसी क्षण थकी (अधायी) नहीं। तुमसे मुझको अपार प्रेम और सौभाग्य मिला, परंतु मैं तुमको कुछ भी नहीं दे सकी॥ १ ॥
मेरी त्रुटि अथवा दोष तुमने कभी नहीं देखे; तुम सदा ही देते रहे, देते-देते कभी थके-(अघाये) नहीं, अपना समस्त प्यार मुझपर उँडे़ल दिया॥ २॥
इसपर भी तुम कहते हो' हे प्यारी! मैं तुझको कुछ भी नहीं दे सका। तुम्हारे जैसी शील-स्वभाव और गुणोंसे युक्त नागरी एक तुम्हीं हो; मैं तुमपर बलिहारी न्योछावर हूँ ' ॥ ३ ॥
मैं अपने प्राण -प्रियतम तुमसे क्या कहूँ; मैं अपनी ओर जब देखती
हूँ तो लाजके मारे गड़ जाती हूँ । प्यारे नन्दकिशोर! (मैं क्या कहूँ)
मेरी प्रत्येक करनीमें तुमको प्रेमके ही दर्शन होते हैं। (यह तुम्हारी
प्रेममयी दृष्टिका चमत्कार है !) ॥ ४ ॥
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