बारह भावना | अनुप्रेक्षा
Автор: Jainsaar Jain Dharm ka Saar
Загружено: 2021-04-12
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भावों की प्रधानता तो सर्वविदित है, भावना ही संसार का कारण भी है और संसार के नाश का भी,
हमारे यहाँ अनेक प्रकार से वैराग्य को करने वाली, जीवन में समता लाने वाली यथार्थ का बोध करने वाली कई भावनाएं कहीं हैं , जैसे वैराग्य भावना, मेरी भावना, और बारह भावना !
देखिये जैसा होगा भाव, वैसा ही होगा परिणाम !
सरल शब्दों में पेश है एक और बारह भावना !
इसकी रचना की है - शुभम जैन "बड़जात्या" , आगरा !
संगीतबद्ध किया है - श्री दीपक जी-रूपक जी, दिल्ली वालों ने (8076742272) वालों ने !
विशेष सहयोग है , श्रीमती शोभा बड़जात्या एवं श्री वीरेंद्र कुमार जी बड़जात्या (आगरा) का !
बारह भावना का तो महत्व कौन नहीं जानता ?
गृहस्थ से लेकर मुनिराज सभी मोक्षार्थी इनका नित चिंतवन करते हैं !
प्रायः करके सभी बारह भवनों में एक ही बात कही है चाहे वह राजा राणा छत्रपति हो, या कहाँ गए चकरी जिन जीता , या देव-शास्त्र-गुरु की पूजा की जयमाला वाली बारह भावना या फिर छहढाला जी की पंचम ढाल वाली बारह भावना !
सभी जीवों को अपने निज स्वरुप का ज्ञान हो , ऐसी भावना के साथ जय जिनेन्द्र !
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----------- * बारह भावना* -----------
हे चेतन तू कब से चल रहा, करता क्यूं विश्राम नहीं,
बड़े बड़े तूने सफर कर लिए, फिर भी तुझे थकान नहीं ?
कभी स्वर्ग में कभी नरक में, भटक रहा भव वन में,
पञ्च परावर्तन नित करता, इसमें कभी उस तन में !
तुझको तेरे करम घुमाते, जो आते और बंध जाते,
चाह यदि है स्थिर सुख की, क्यूं नहीं संवर साधे !
संवर से यह कर्म रुकें हैं, जीव मुक्ति पथ पावे,
संवर सहित करे जब निर्जर, तब ही शिव उपजावे !
संवर करने भावन भाओ, द्वादश जो जिन देव कहे,
नित्य नित्य वही ध्यावें इनको, मुक्ति जिनका लक्ष्य रहे !
---------- अनित्य भावना ----------
जिनके नाम से धरती काँपी, जिनको बड़ा गुरूर था,
कहाँ खो गए जीव वो सारे, रूतवा जिनका भरपूर था !
कल जो था वो आज नहीं है, आज है सो कल हो ना !
पर्यायों का काम यही है, नित परिवर्तित होना !
नित्य जो है तू दृष्टि वहां कर, वही सदा रहता है,
तू नित्य पर्याय अनित्य, आगम यही कहता है !
---------- अशरण भावना ----------
इस संसार में कौन है ऐसा, मृत्यु न जिसकी आए ?
इस मृत्यु से जो बच जाए, सो भगवान् कहाए !
आयु पूर्ण की घड़ी जब आए, कुछ भी काम न करता,
देव, नारकी, त्रियग, मनुष्य, कोई भी हो मरता !
तुझको मात्र शरण है तू ही, कहां मदद तू पावे ?
आदि-व्याधि वध देह के होते, क्यूं नही आत्म ध्यावे ?
---------- संसार भावना ----------
इस संसार में कौन सुखी है, जहां भी देखो दुःख है,
जन्मे तो दुःख, मरते भी दुःख, जीते जी भी दुःख है !
जिसकी ख़ोज में भटके मृग वो, कस्तूरी उसी के पास है,
निकट की वस्तु दूर जो ढूंढे, कहां मिलन की आस है ?
बाहर जिसको तू सुख माने, वो सुख का आभास है,
सच्चा सुख तो अंदर तेरे, तू खुद सुख का आवास है !
---------- एकत्व भावना ----------
सबसे भिन्न है सबसे न्यारा, तू रहे अकेला सदा ही,
पल दो पल की बात अलग है, सदा साथ कोई नाहीं !
संग साथी चेतन रु अचेतन, संयोग से साथ हैं आए,
जब बिछड़न का योग बने तब, रोके न रुकने पाएं !
इनमे बुद्धि और समय तू, कितना व्यर्थ है खोता,
तू अकेला ही सदा रहेगा, कोई किसी का नहीं होता !
---------- अन्यत्व भावना ----------
घर- घरवाले, सर्व-सम्पदा, ये तो प्रकट जुदा हैं,
जिसमे प्रति-पल रमा रहे तू, वो देह भी तेरी कहाँ है ?
इस जग में सब जुदे जुदे हैं, मेल हो ही नहीं सकता,
दो द्रव्य यदि एक हो जाएँ, मिट जाए उनकी सत्ता !
पर-द्रव्यों में रागी हो कर, अब कर मत तू ममता,
अन्यत्व भावना यही सिखाये, करना धारण समता !
---------- अशुचि भावना ----------
देह पर लिपटी चमड़ी देख, तू मोहित होता जाए,
चमड़ी बिना यदि देह दिख जाए, मोह भंग हो जाए !
अंदर इसमें खून, हड्डियां, मांस, पीव और है मल,
ये अति मैली, करकट थैली, तू स्वभाव से निर्मल !
जब ये कभी शुद्ध हो ही सके न, फिर इसमें क्यों लगना ?
देह से ध्यान हटाकर कर अब, भावों को निर्मल करना !
---------- आस्रव भावना ----------
जैसे घर में चोर घुस आवें, द्वार खुला यदि हो तो,
वैसे ही यह कर्म हैं आते, लूटने तेरी निधि को !
कर्मों के आने के द्वार को, आस्रव जिनवर कहते,
योग, मोह, अविरत, कषाय से, द्वार खुले यह रहते !
जब तक कर्म ये आते रहेंगे, तुझे मरते रहना होगा,
मरने से यदि बचना है तो, संवर करना होगा !
---------- संवर भावना ----------
कर्मों को आने से रोके, ऐसा भाव है संवर,
संवर के बिन कर्म रुकें न, कहते ऐसा गुरुवर !
समिति-गुप्ति कर, भावन भाना, धर्म सदा अपनाना,
एक एक करके द्वार सत्तावन, बंद तू करते जाना !
संवर होवे जिनके वही निश्चय, से मुक्ति के पात्र हैं,
संवर रहित जो जीवन जीते, वे भोगें बहु त्रास हैं !
---------- निर्जरा भावना ----------
संवर से बस इतना हुआ कि, रुका कर्म का आगमन,
पहले से जो बंधे हुए हैं, वो होने दें न मोक्ष गमन !
.....
यहाँ जगह कम होने के कारन पूरी भावना नहीं लिखी है, आप लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं !
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