ycliper

Популярное

Музыка Кино и Анимация Автомобили Животные Спорт Путешествия Игры Юмор

Интересные видео

2025 Сериалы Трейлеры Новости Как сделать Видеоуроки Diy своими руками

Топ запросов

смотреть а4 schoolboy runaway турецкий сериал смотреть мультфильмы эдисон
Скачать

बारह भावना | अनुप्रेक्षा

Автор: Jainsaar Jain Dharm ka Saar

Загружено: 2021-04-12

Просмотров: 18544

Описание: भावों की प्रधानता तो सर्वविदित है, भावना ही संसार का कारण भी है और संसार के नाश का भी,
हमारे यहाँ अनेक प्रकार से वैराग्य को करने वाली, जीवन में समता लाने वाली यथार्थ का बोध करने वाली कई भावनाएं कहीं हैं , जैसे वैराग्य भावना, मेरी भावना, और बारह भावना !

देखिये जैसा होगा भाव, वैसा ही होगा परिणाम !

सरल शब्दों में पेश है एक और बारह भावना !
इसकी रचना की है - शुभम जैन "बड़जात्या" , आगरा !
संगीतबद्ध किया है - श्री दीपक जी-रूपक जी, दिल्ली वालों ने (8076742272) वालों ने !
विशेष सहयोग है , श्रीमती शोभा बड़जात्या एवं श्री वीरेंद्र कुमार जी बड़जात्या (आगरा) का !

बारह भावना का तो महत्व कौन नहीं जानता ?
गृहस्थ से लेकर मुनिराज सभी मोक्षार्थी इनका नित चिंतवन करते हैं !
प्रायः करके सभी बारह भवनों में एक ही बात कही है चाहे वह राजा राणा छत्रपति हो, या कहाँ गए चकरी जिन जीता , या देव-शास्त्र-गुरु की पूजा की जयमाला वाली बारह भावना या फिर छहढाला जी की पंचम ढाल वाली बारह भावना !

सभी जीवों को अपने निज स्वरुप का ज्ञान हो , ऐसी भावना के साथ जय जिनेन्द्र !
***
----------- * बारह भावना* -----------
हे चेतन तू कब से चल रहा, करता क्यूं विश्राम नहीं,
बड़े बड़े तूने सफर कर लिए, फिर भी तुझे थकान नहीं ?

कभी स्वर्ग में कभी नरक में, भटक रहा भव वन में,
पञ्च परावर्तन नित करता, इसमें कभी उस तन में !

तुझको तेरे करम घुमाते, जो आते और बंध जाते,
चाह यदि है स्थिर सुख की, क्यूं नहीं संवर साधे !

संवर से यह कर्म रुकें हैं, जीव मुक्ति पथ पावे,
संवर सहित करे जब निर्जर, तब ही शिव उपजावे !

संवर करने भावन भाओ, द्वादश जो जिन देव कहे,
नित्य नित्य वही ध्यावें इनको, मुक्ति जिनका लक्ष्य रहे !

---------- अनित्य भावना ----------
जिनके नाम से धरती काँपी, जिनको बड़ा गुरूर था,
कहाँ खो गए जीव वो सारे, रूतवा जिनका भरपूर था !

कल जो था वो आज नहीं है, आज है सो कल हो ना !
पर्यायों का काम यही है, नित परिवर्तित होना !

नित्य जो है तू दृष्टि वहां कर, वही सदा रहता है,
तू नित्य पर्याय अनित्य, आगम यही कहता है !

---------- अशरण भावना ----------
इस संसार में कौन है ऐसा, मृत्यु न जिसकी आए ?
इस मृत्यु से जो बच जाए, सो भगवान् कहाए !

आयु पूर्ण की घड़ी जब आए, कुछ भी काम न करता,
देव, नारकी, त्रियग, मनुष्य, कोई भी हो मरता !

तुझको मात्र शरण है तू ही, कहां मदद तू पावे ?
आदि-व्याधि वध देह के होते, क्यूं नही आत्म ध्यावे ?


---------- संसार भावना ----------
इस संसार में कौन सुखी है, जहां भी देखो दुःख है,
जन्मे तो दुःख, मरते भी दुःख, जीते जी भी दुःख है !

जिसकी ख़ोज में भटके मृग वो, कस्तूरी उसी के पास है,
निकट की वस्तु दूर जो ढूंढे, कहां मिलन की आस है ?

बाहर जिसको तू सुख माने, वो सुख का आभास है,
सच्चा सुख तो अंदर तेरे, तू खुद सुख का आवास है !

---------- एकत्व भावना ----------
सबसे भिन्न है सबसे न्यारा, तू रहे अकेला सदा ही,
पल दो पल की बात अलग है, सदा साथ कोई नाहीं !

संग साथी चेतन रु अचेतन, संयोग से साथ हैं आए,
जब बिछड़न का योग बने तब, रोके न रुकने पाएं !

इनमे बुद्धि और समय तू, कितना व्यर्थ है खोता,
तू अकेला ही सदा रहेगा, कोई किसी का नहीं होता !

---------- अन्यत्व भावना ----------
घर- घरवाले, सर्व-सम्पदा, ये तो प्रकट जुदा हैं,
जिसमे प्रति-पल रमा रहे तू, वो देह भी तेरी कहाँ है ?

इस जग में सब जुदे जुदे हैं, मेल हो ही नहीं सकता,
दो द्रव्य यदि एक हो जाएँ, मिट जाए उनकी सत्ता !

पर-द्रव्यों में रागी हो कर, अब कर मत तू ममता,
अन्यत्व भावना यही सिखाये, करना धारण समता !

---------- अशुचि भावना ----------
देह पर लिपटी चमड़ी देख, तू मोहित होता जाए,
चमड़ी बिना यदि देह दिख जाए, मोह भंग हो जाए !

अंदर इसमें खून, हड्डियां, मांस, पीव और है मल,
ये अति मैली, करकट थैली, तू स्वभाव से निर्मल !

जब ये कभी शुद्ध हो ही सके न, फिर इसमें क्यों लगना ?
देह से ध्यान हटाकर कर अब, भावों को निर्मल करना !

---------- आस्रव भावना ----------
जैसे घर में चोर घुस आवें, द्वार खुला यदि हो तो,
वैसे ही यह कर्म हैं आते, लूटने तेरी निधि को !

कर्मों के आने के द्वार को, आस्रव जिनवर कहते,
योग, मोह, अविरत, कषाय से, द्वार खुले यह रहते !

जब तक कर्म ये आते रहेंगे, तुझे मरते रहना होगा,
मरने से यदि बचना है तो, संवर करना होगा !

---------- संवर भावना ----------
कर्मों को आने से रोके, ऐसा भाव है संवर,
संवर के बिन कर्म रुकें न, कहते ऐसा गुरुवर !

समिति-गुप्ति कर, भावन भाना, धर्म सदा अपनाना,
एक एक करके द्वार सत्तावन, बंद तू करते जाना !

संवर होवे जिनके वही निश्चय, से मुक्ति के पात्र हैं,
संवर रहित जो जीवन जीते, वे भोगें बहु त्रास हैं !

---------- निर्जरा भावना ----------
संवर से बस इतना हुआ कि, रुका कर्म का आगमन,
पहले से जो बंधे हुए हैं, वो होने दें न मोक्ष गमन !
.....

यहाँ जगह कम होने के कारन पूरी भावना नहीं लिखी है, आप लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं !

Не удается загрузить Youtube-плеер. Проверьте блокировку Youtube в вашей сети.
Повторяем попытку...
बारह भावना | अनुप्रेक्षा

Поделиться в:

Доступные форматы для скачивания:

Скачать видео

  • Информация по загрузке:

Скачать аудио

Похожие видео

BARAH BHAVNA | बारह भावना | DR. HUKAMCHAND BHARILL | भोर की स्वर्णिम छटा | DIVYANSH JAIN

BARAH BHAVNA | बारह भावना | DR. HUKAMCHAND BHARILL | भोर की स्वर्णिम छटा | DIVYANSH JAIN

समाधितंत्र हिंदी गाथाएँ SamadhiTantra Hindi Gatha हिंदी पद्धानुवाद हरीगीत

समाधितंत्र हिंदी गाथाएँ SamadhiTantra Hindi Gatha हिंदी पद्धानुवाद हरीगीत

श्री नवदेवता भक्ति

श्री नवदेवता भक्ति

Samadhi Maran Path | समाधीमरण पाठ | Dr. Gaurav & Deepshikha Sogani | पंडित सूरचंद्र जी रचित

Samadhi Maran Path | समाधीमरण पाठ | Dr. Gaurav & Deepshikha Sogani | पंडित सूरचंद्र जी रचित

Bhawna-Shri Aadinathay Namah

Bhawna-Shri Aadinathay Namah

КЛАССИЧЕСКАЯ МУЗЫКА ДЛЯ ВОССТАНОВЛЕНИЯ НЕРВНОЙ СИСТЕМЫ🌿 Нежная музыка успокаивает нервную систему 22

КЛАССИЧЕСКАЯ МУЗЫКА ДЛЯ ВОССТАНОВЛЕНИЯ НЕРВНОЙ СИСТЕМЫ🌿 Нежная музыка успокаивает нервную систему 22

बारह भावना बड़ी || कहा गये चक्री.. || Barah Bhavna Badi || Lyrics || Kaha Gaye Chakri.. ||

बारह भावना बड़ी || कहा गये चक्री.. || Barah Bhavna Badi || Lyrics || Kaha Gaye Chakri.. ||

बारह भावना अर्थात् संसार की बारह सच्चाईयाॅं (मार्मिक विवेचन) : डाॅ. मनीष, मेरठ : 11.4.2025

बारह भावना अर्थात् संसार की बारह सच्चाईयाॅं (मार्मिक विवेचन) : डाॅ. मनीष, मेरठ : 11.4.2025

1. श्री समयसार गाथा पद्यानुवाद - पूर्वरंग || गाथा 1-38 || डॉ.हुकमचंद भारिल्ल || #drbharill #ptst

1. श्री समयसार गाथा पद्यानुवाद - पूर्वरंग || गाथा 1-38 || डॉ.हुकमचंद भारिल्ल || #drbharill #ptst

बारह भावना || भोर की स्वर्णिम छटा || डॉ.हुकमचंद भारिल्ल  || Barah Bhavna || Dr. Hukamchand Bharill

बारह भावना || भोर की स्वर्णिम छटा || डॉ.हुकमचंद भारिल्ल || Barah Bhavna || Dr. Hukamchand Bharill

"आत्मबोध शतक भाग 2 - "निज-आत्म" का बोध कराने वाला आ. पूर्णमति माताजी द्वारा रचित |Aatm Bodh Shatak 2

बारह भावना | कहा गए वे चक्री | Barah Bhawna | Kaha Gaye Ve Chakri | जैन भावना

बारह भावना | कहा गए वे चक्री | Barah Bhawna | Kaha Gaye Ve Chakri | जैन भावना

Bhaktamar Strot / भक्तामर स्त्रोत आर्यिका 105 पूर्णमति माताजी के स्वर में भक्तामर स्त्रोत

Bhaktamar Strot / भक्तामर स्त्रोत आर्यिका 105 पूर्णमति माताजी के स्वर में भक्तामर स्त्रोत

छहढाला | Chhahdhala | Kavivar Pandit Daulatram Ji | Digital art by CA Akshay Jain.

छहढाला | Chhahdhala | Kavivar Pandit Daulatram Ji | Digital art by CA Akshay Jain.

श्री नंदीश्वर द्वीप भक्ति | www.jainsaar.in

श्री नंदीश्वर द्वीप भक्ति | www.jainsaar.in

SAMAYIK PATH || सामायिक पाठ हिंदी || जैन भजन ||

SAMAYIK PATH || सामायिक पाठ हिंदी || जैन भजन ||

वैराग्य महाकाव्य || बारहवाँ सर्ग || Vairagya Mahakavya Sarg-12 || Dr Hukamchand Bharill || #ptst

वैराग्य महाकाव्य || बारहवाँ सर्ग || Vairagya Mahakavya Sarg-12 || Dr Hukamchand Bharill || #ptst

||धन्य-धन्य वो क्षण|| Dhanya Dhanya wo Kshan||

||धन्य-धन्य वो क्षण|| Dhanya Dhanya wo Kshan||

निर्ग्रन्थ भावना || Nirgranth bhavna ||निर्ग्रन्थ की भावना ||बाल. ब्र.रविन्द्र जी आत्मन||Jain bhajan

निर्ग्रन्थ भावना || Nirgranth bhavna ||निर्ग्रन्थ की भावना ||बाल. ब्र.रविन्द्र जी आत्मन||Jain bhajan

बारह भावना /Barah Bhawana अर्थ सहित( Animation Video) | Raja rana chatpati,Barah Bhavana

बारह भावना /Barah Bhawana अर्थ सहित( Animation Video) | Raja rana chatpati,Barah Bhavana

© 2025 ycliper. Все права защищены.



  • Контакты
  • О нас
  • Политика конфиденциальности



Контакты для правообладателей: [email protected]