मुंबई | Ep. 033 | भीड़ वही है, बोझ और बढ़ गया — अलग आवाज़
Автор: शहर की खबरें – न्यूज़ कराओके
Загружено: 2026-02-12
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Today feels tighter than usual.
मुंबई लोकल — बालिका के साथ छेड़छाड़
रेल परिसर — आरोपी गिरफ्तार
करजत-बंध ट्रेन — यात्री शिकायत दर्ज
प्लैटफ़ॉर्म की टिक-टिक, बारिश ने छत पर ठोक दी सुबह।
काँचे की रोशनी में चाय की भाप, भीड़ की हथेली छूती है रेल की साइड।
टिकट रसीदें टिशू में लिपटी हैं।
#मुंबई #खबर #कराओके #गाना #शहर
Music style: Mumbai Gully Rap
Tags: mumbai, newskaraoke, news, karaoke, nyhetsrytm, rap
Lyrics:
प्लैटफ़ॉर्म की टिक-टिक, बारिश ने छत पर ठोक दी सुबह।
काँचे की रोशनी में चाय की भाप, भीड़ की हथेली छूती है रेल की साइड।
टिकट रसीदें टिशू में लिपटी हैं।
चेहरों पर थकन; कोई जल्दी में, कोई ठहरा हुआ।
मोबाइल की स्क्रीन पर सूनी खबरें गोल-गोल चलती हैं।
किसी की आवाज़ तेज, किसी की आंखें नम।
गली के कोने पर लिफ्ट बंद, पैरों की आहट धीमी।
एक आदमी बातों में छोटा, एक नाम कान में फिसला।
रात के पेड़ तिनके बन कर खड़े हैं, बिजली की डोरी हिलती है।
किसी ने कहा—दरवाज़ा बंद रहना बेहतर है। किसी ने कहा—सुनो चलो।
भीड़ से उठती फुसफुसाहट, सबकी नज़रें जमीन पर टिकती हैं।
ट्रेन के स्टील की ठंडक हाथ पर जम जाती है।
बच्चे की रुला-सी हँसी, बूढ़ों की धीमी चाल।
एक शब्द हवा में घुलता है, डर नहीं कहता सीधे।
हाथों में बँधे हल्की-सी थकान, मगर कदम चलते हैं।
रात की खबरों ने पेट में पत्थर रख दिया है।
सड़क पर टैक्सी की पीटी आवाज़, रेड लाइट पर धूप खड़ी है।
किसी ने खिड़की से देखा—किसी ने लड़खड़ाहट छुपाई।
हुक: हम चलते हैं। हम चलते हैं।
हम चलते हैं। हम चलते हैं।
किसी दिन की सैर, किसी दिन की रियायतें कम होती हैं।
घर की रेखा पर बिल टिक जाते हैं, गैस का झोंका चुप रहता है।
बुज़ुर्ग कहते हैं—समय बदलता है, पर चेहरे वही रहते हैं।
छोटी गली में झूठी मुस्कानें, बड़े रास्तों पर थकानें।
किसी ट्रेन में गुनगुनाहट, किसी को चुप्पी अच्छी लगती है।
कंधे की थकान अपने-अपने जेबों में समेटती है।
एक स्टॉप पर कोई चिल्ला कर नहीं बोला, बस सिहर गया।
किसी को खबर मिली, किसी ने खबरें पढ़ी और आँखें बंद कीं।
ट्रैफिक सिग्नल की आवाज़ कटती है, इश्क़ नहीं, कमीने मेल आते हैं।
कागज़ की सूखी खबर पर अंगूठा लगता है।
किसी ने कहा—आज की रात सुनसान होगी, किसी ने कहा—आज की रात लंबी।
हुक: हम चलते हैं। हम चलते हैं।
हम चलते हैं। हम चलते हैं।
बारिश ने ठोकर दे दी, जूतों में पानी ठहरा।
किसी का नाम हवा में घुमता रहा, पर ठोस ठिकाना न मिला।
घर की सीढ़ियाँ चूखी हुई, आलमारी में पुरानी टोपी।
खिड़की के बाहर वही सारा शहर चलता-फिरता।
ट्रेन की सीटी दूर, प्लेटफॉर्म पर कीचड़ सूख रहा है।
कई चेहरे अनदेखे, कई बातें अधूरी।
हम चलते हैं। हम चलते हैं।
रास्ते चलते हैं।
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