अवधूत गीता (अध्याय ७,८)| avadhoot geeta part 7,8
Автор: Tatva Gyan
Загружено: 2025-07-04
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अवधूत गीता का सातवाँ वा आठवां अध्याय, भगवान दत्तात्रेय जी के उपदेशों का वर्णन करता है। यह अध्याय, 'ज्ञान-विज्ञान योग' के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को अपने स्वरूप और प्रकृति का ज्ञान कराते हैं।
सातवें अध्याय में, भगवान कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि वे ही इस जगत के मूल कारण हैं, और सब कुछ उन्हीं में से उत्पन्न होकर उन्हीं में विलीन हो जाता है।
मुख्य बातें:
ज्ञान-विज्ञान योग:
यह अध्याय ज्ञान और विज्ञान के माध्यम से भगवान के स्वरूप को समझने पर जोर देता है।
भगवान की प्रकृति:
कृष्ण अपनी अपरा और परा प्रकृति का वर्णन करते हैं। अपरा प्रकृति में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार शामिल हैं, जबकि परा प्रकृति जीव रूप है जो इस जगत को धारण करती है।
सर्वव्यापीता:
भगवान कृष्ण कहते हैं कि वे ही इस जगत के हर कण में मौजूद हैं, जैसे धागे में मोती पिरोए हुए हों।
माया:
अध्याय में माया का भी उल्लेख है, जो भगवान की एक शक्ति है जो इस जगत को मोहित करती है।
समर्पण:
भगवान कृष्ण अर्जुन को अपने प्रति पूर्ण समर्पण करने और उनकी शिक्षाओं का पालन करने के लिए कहते हैं।
सातवें अध्याय के कुछ महत्वपूर्ण श्लोक:
श्लोक 7:
"मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युंजन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।" (हे पार्थ! मुझमें मन लगाकर, मेरी शरण में रहकर, योग का अभ्यास करता हुआ तू निःसंदेह मुझको भलीभांति जान जाएगा, वह मैं कहता हूँ, सुन।)
श्लोक 20:
"येऽप्यन्यदेव E, तानियत श्रद्धां, ददामि...।" (जो भक्त जिस देवता की पूजा करता है, मैं उसी देवता के प्रति उसकी श्रद्धा को दृढ़ करता हूँ।)
सातवें अध्याय का महत्व:
यह अध्याय ज्ञान और विज्ञान के माध्यम से भगवान के स्वरूप को समझने का मार्ग दिखाता है।
यह मनुष्य को माया के प्रभाव से मुक्त होने और भगवान की शरण में जाने का उपदेश देता है।
यह अध्याय मनुष्य को कर्मों के बंधन से मुक्त होने और मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है।
ॐ शान्ति विश्वम्।।
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