बात मेरी कभी सुनी ही नहीं | Daagh Dehlvi की Top इश्क शायरी | Love Poetry | Mumtaz Khan | Sahitya Tak
Автор: Sahitya Tak
Загружено: 2020-10-25
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दाग़ देहलवी उर्दू के आला शायर थे. उनका असली नवाब मिर्जा खाँ था. कहते हैं कि उनका जन्म 25 मई, 1831 को दिल्ली में हुआ था. उनके पिता शम्सुद्दीन खाँ नवाब लोहारू के भाई थे. जब दाग छोटे ही थे, तभी पिता की मृत्यु हो गई. बाद में दाग की मां ने मुगलिया सल्तनत के अंतिम बादशाह बहादुर शाह 'ज़फर' के पुत्र मिर्जा फखरू से शादी कर ली. इसके बाद दाग दिल्ली के लाल किले में रहने लगे. यहां दाग को हर तरह की शिक्षा मिलने लगी. दाग को शायरी का शौक भी यहीं लगा. उन्होंने जौक़ को अपना गुरु बनाया. अपने भीतर के शायर के लिए उन्होंने दाग नाम चुना था, और देहलवी यानी दिल्लीवाला को उन्होंने अपना तखल्लुस बनाया. मुमताज़ खान से सुनिए दाग देहलवी की चंद ग़ज़लें साहित्य तक पर. पढ़ें पूरी शायरी...
बात मेरी कभी सुनी ही नहीं
जानते वो बुरी भली ही नहीं
दिल-लगी उन की दिल-लगी ही नहीं
रंज भी है फ़क़त हँसी ही नहीं
लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद
हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं
उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से
कभी गोया किसी में थी ही नहीं
जान क्या दूँ कि जानता हूँ मैं
तुम ने ये चीज़ ले के दी ही नहीं
हम तो दुश्मन को दोस्त कर लेते
पर करें क्या तिरी ख़ुशी ही नहीं
हम तिरी आरज़ू पे जीते हैं
ये नहीं है तो ज़िंदगी ही नहीं
दिल-लगी दिल-लगी नहीं नासेह
तेरे दिल को अभी लगी ही नहीं
'दाग़' क्यूँ तुम को बेवफ़ा कहता
वो शिकायत का आदमी ही नहीं
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आरज़ू है वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तो क्या करे कोई
गर मरज़ हो दवा करे कोई
मरने वाले का क्या करे कोई
कोसते हैं जले हुए क्या क्या
अपने हक़ में दुआ करे कोई
उन से सब अपनी अपनी कहते हैं
मेरा मतलब अदा करे कोई
चाह से आप को तो नफ़रत है
मुझ को चाहे ख़ुदा करे कोई
उस गिले को गिला नहीं कहते
गर मज़े का गिला करे कोई
ये मिली दाद रंज-ए-फ़ुर्क़त की
और दिल का कहा करे कोई
तुम सरापा हो सूरत-ए-तस्वीर
तुम से फिर बात क्या करे कोई
कहते हैं हम नहीं ख़ुदा-ए-करीम
क्यूँ हमारी ख़ता करे कोई
जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई
इस जफ़ा पर तुम्हें तमन्ना है
कि मिरी इल्तिजा करे कोई
मुँह लगाते ही 'दाग़' इतराया
लुत्फ़ है फिर जफ़ा करे कोई
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इस नहीं का कोई इलाज नहीं
रोज़ कहते हैं आप आज नहीं
कल जो था आज वो मिज़ाज नहीं
इस तलव्वुन का कुछ इलाज नहीं
आइना देखते ही इतराए
फिर ये क्या है अगर मिज़ाज नहीं
ले के दिल रख लो काम आएगा
गो अभी तुम को एहतियाज नहीं
हो सकें हम मिज़ाज-दाँ क्यूँकर
हम को मिलता तिरा मिज़ाज नहीं
चुप लगी लाल-ए-जाँ-फ़ज़ा को तिरे
इस मसीहा का कुछ इलाज नहीं
दिल-ए-बे-मुद्दआ ख़ुदा ने दिया
अब किसी शय की एहतियाज नहीं
खोटे दामों में ये भी क्या ठहरा
दिरहम-ए-'दाग़' का रिवाज नहीं
बे-नियाज़ी की शान कहती है
बंदगी की कुछ एहतियाज नहीं
दिल-लगी कीजिए रक़ीबों से
इस तरह का मिरा मिज़ाज नहीं
इश्क़ है पादशाह-ए-आलम-गीर
गरचे ज़ाहिर में तख़्त-ओ-ताज नहीं
दर्द-ए-फ़ुर्क़त की गो दवा है विसाल
इस के क़ाबिल भी हर मिज़ाज नहीं
यास ने क्या बुझा दिया दिल को
कि तड़प कैसी इख़्तिलाज नहीं
हम तो सीरत-पसंद आशिक़ हैं
ख़ूब-रू क्या जो ख़ुश-मिज़ाज नहीं
हूर से पूछता हूँ जन्नत में
इस जगह क्या बुतों का राज नहीं
सब्र भी दिल को 'दाग़' दे लेंगे
अभी कुछ इस की एहतियाज नहीं
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