कर्मण्येवाधिकारस्ते – कर्मयोग का शाश्वत संदेश (गीता 2.47)- भगवद गीता श्लोक..
Автор: Radhakrishna Bhakti Vani
Загружено: 2026-01-15
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भगवद गीता का यह अमर श्लोक हमें सिखाता है कि हमारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में नहीं। जब मनुष्य निष्काम भाव से, बिना फल की आसक्ति के कर्म करता है, तभी वह सच्चे अर्थों में मुक्त और शांत रहता है। यह श्लोक कर्मयोग, समत्व और आत्मिक संतुलन का मूल मंत्र है।
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