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Vanraji Tribe, उत्तराखंड की दुर्लभ वनराजी जनजाति || Tribes of Uttrakhand || वनरावत, Shy jungle kings

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GhumakkadJeewan

Автор: घुमक्कड़ जीवन Ghumakkad Jeewan

Загружено: 2022-11-12

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Описание: उत्तराखंड की पांच जनजातियों थारू, बोक्सा, भोटिया, जौनसारी और वनराजी में संभवतः सबसे पिछड़ी और कम जनसंख्या वाली जनजाति है वनराजी. यह जनजाति उत्तराखंड के अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित पिथौरागढ़ और चम्पावत जिले के दूरस्थ जंगलों के बीच बसे गांवों में रहते हैं. इसके अतिरिक्त नेपाल के पश्चिम अंचल में भी इनके कुछ छोटे गांव बसे हैं. हालांकि इनकी सर्वाधिक आबादी पिथौरागढ़ जिले में ही है. जहां पर डीडीहाट, धारचूला और कनालीछीना विकासखंडों में इनके करीब आठ दस गांव हैं. कुछ को तो गांव न कह कर एक तोक मात्र कहा जा सकता है क्योंकि उनमें चार पांच ही परिवार रहते हैं.

डीडीहाट विकासखंड में कूटा चौरानी इनका सबसे बड़ा और सबसे दुर्गम गांव है, जिसकी 110 की आबादी 22 परिवारों में रहती है. गांव में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है. और जिसकी मुख्य सड़क से पैदल दूरी 5 किलोमीटर है. कूटा कन्याल गांव में भी इनके दो परिवार रहते हैं.

कूटा चौरानी गांव घनधूरा के जंगल के बीचों बीच सिंधुतल से 1500 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ के दक्षिणी ढाल पर स्थित है. इसी पहाड़ी की जड़ पर इनका एक और गांव मदनपुरी बसा है जहां पर करीब 16 परिवार और 80 की जनसंख्या है.

इसके बाद कनालीछीना ब्लॉक में इनके गांव कूटा जमतड़ी है, जहां के लिए मदनपुरी होते हुए पीएमजीएसवाई की एक और सड़क देवीबिसौना स्थान से कटी है. देवीबिसौना इस पूरे क्षेत्र का मोटर रोड का एक पड़ाव है. जहां पर एक हाई स्कूल, एक आयुर्वेदिक अस्पताल एक सरकारी राशन की दुकान, पशु अस्पताल, और आधे दर्जन दुकानें हैं.

कूटा जमतड़ी भी करीब बीस इक्कीस परिवारों का गांव है. इसी ब्लॉक में इनका दूसरा गांव औलतड़ी है जो भगीचौरा कस्बे से करीब आठ किलोमीटर की पैदल ओलार (डाउन) में है. जहां पर के दस बारह परिवारों में से कुछ भागीचौरा कस्बे के निकट रौत्यूड़ा में बस गए हैं. फिर धारचूला ब्लॉक में इनकी सबसे बड़ी आबादी क्रमशः चिफलतरा, गणागांव, भकतिरूवा और किमखोला, थामा धूरा और मनख्या बसौर गांवो में निवास करती है. फिर इसके बाद काली और गोरी नदियों के पन ढाल के साथ साथ चम्पावत में चल्थी के जंगलों के बीच स्थित खिर द्वारी और शील बरुड़ी में ये बसे हुए हैं. दोनों जिलों के सभी गांवों की कुल आबादी हजार से डेढ़ हजार के बीच ही होगी.

कुछ दशक पहले तक अनुमान से साठ के दशक तक इनकी आबादी का काफी हिस्सा शिकारी संग्राहक (हंटर गैदरर) ही था साल का काफी समय ओढ्यारों (कंदराओं) में बिताता था. इनके जीवन को मुख्य धारा के बीच चर्चा में लाने का श्रेय डॉ0 प्रयाग जोशी द्वारा सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों में इनके बीच की गई यात्राओं और उन अनुभवों पर लिखी किताब “वन रजियों की खोज में” को जाता है.

पहली बार 1815 के आसपास ब्रिटिश कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर जॉर्ज डब्ल्यू ट्रेल ने अपनी कुमाऊं की यात्राओं के दौरान इनके बारे में स्थानीय निवासियों से सुनी बातों के आधार पर थोड़ी बहुत जानकारी दुनिया के सामने रख दी थी, और एटकिंसन के गजेटियर में भी इनका छोटा सा वर्णन इन्हें पूरी तरह जंगली जनजाति और नितांत असभ्य और बर्बर दिखाते हुए किया गया था. एक मानवीय दृष्टि से इनके बीच रहकर इनके जीवन के पहुलुओं को संसार के सामने लाने में डॉ प्रयाग जोशी का योगदान उल्लेखनीय है.

इन पर संभवतः अब तक सैकड़ों शोध थीसिस और पीएचडी लिखी जा चुकी होंगी. आज इन पर कई एन्थ्रोपोलॉजिकल, सोशियो इकोनोमिकल और भाषाई शोध हो चुके हैं मगर इसके बाद भी वन राजी शोध और उत्सुकता का विषय प्रायः बने रहे हैं.

आम मीडिया में इनके बारे में लिखा जाता है ये अब वैसे नहीं रह गए हैं इनका रहन सहन, खान पान, रीति रिवाज और पहनावा काफी हद तक इनके करीबी गांवों के आम निवासियों जैसे ही हो चुके हैं. ये उनके बीच काम करने जाते हैं, बाज़ार में खरीददारी करने, मनरेगा के काम करने या अपना प्रिय लकड़ी चिरान का काम करने आस पास और कभी कभी दूर के गांवों और कस्बों तक भी जाते हैं. इनके कई नवयुवक हमारे अन्य पहाड़ी लड़कों की तरह मैदान के महानगरों में छोटी मोटी नौकरी करने भी जाते हैं. हालांकि इनके बीच शिक्षा प्राप्ति की स्थिति इस बात से देखी जा सकती है कि तीन गांवों में से पहली बार इनका कोई सदस्य हाईस्कूल बोर्ड पास हुआ वर्ष 2016 में एक बालिका जानकी.

एक बालिका मंजू जो जमतड़ी गांव की रहने वाली थी दस बारह साल पहले इनकी पूरी आबादी में पहली हाईस्कूल पास करने वाली सदस्य है. संवैधानिक तौर पर राजियों को शेड्यूल्ड ट्राइब या आरक्षित जनजाति का दर्जा दिया गया है. जिसका लाभ इन्हें सरकारी नौकरियों में तो अभी तक दिखाई नहीं दिया है. हां राजनैतिक तौर पर इन्हें ग्राम पंचायत से विधान सभा तक चुने जाने के अवसर जरूर मिले हैं. अत्यंत गरीबी में अपने अधिकांश सदस्यों की तरह ही जीवन यापन करते मात्र आठवीं तक पढ़ सके गगन सिंह रजवार उत्तराखंड सरकार में दो बार लगातार निर्दलीय विधायक रह चुके हैं.


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