ll Part |भीजत मोहनी मोहन|वृन्दावन समाज गायन|टटिया स्थान|
Автор: BRAJPAD RAAGSEVA
Загружено: 2025-12-23
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PART (l)
भीजत मोहनी मोहन हरषि हिंडोरना दोऊ झूलत हैं।।
मधुर मत्त मनोज मन मकरंद लेत सुछंद ।
द्रुम दलनि बेलि नवेलि नव रस लटकि लिपटनि मंद ।।१।।
झुकि जात आत डरात बातनि करत कोमल फंद।
गहि लेत डाँड़ीं तरुनि कर उर अरत आनंद कंद ।।२।।
सुवन बन गुन गननि गावत बरनि बर सुख पात।।
मुदित मधुकर मदन मादिक मिलत मन न अघात ।॥३॥
मरुत मंद सुगंध सीतल सुखद मुख रुख गात ।
डगमगत द्रुम स्रम समन करनि पराग परसि गिरात। ॥४॥
जुवति जूथनि जुरि परस्पर झूलि झुकनि झुलात ।
पिय प्रेम गाथा गात सकुचि डरात फिरि तुतरात ॥५॥
नैंन ब्रीड़त करत क्रीड़ा मैंन मन न समात ।
निसि भोर दासिकिसोर बिबि बन बन बिबिध बिलसात ।॥६॥
SAMAJ GAYAN : HERITAGE OF BRAJ MUSIC (RAAG SEVA)
वृन्दावन की हरिदासी सम्प्रदाय और उसकी समाज गायन परम्परा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानवता की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है। यह हमें सिखाती है कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक 'साधना' है—एक ऐसी सीढ़ी जिससे चढ़कर जीव 'निकुंज' के नित्य विहार में प्रवेश कर सकता है।
ब्रज रसीकों के लियें भाव की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति 'नाद' (Sound) है। चाहे वह टटिया स्थान की रेतीली भूमि पर गाए जाने वाले शांत ध्रुपद हों या बांके बिहारी मंदिर में होली के समय गूँजने वाले उल्लासपूर्ण धमार, यह संगीत एक अदृश्य पुल का निर्माण करता है—भक्त और भगवान के बीच, और 16वीं सदी के भक्ति काल और 21वीं सदी के आधुनिक भारत के बीच। जब तक पखावज की थाप वृन्दावन की गलियों में गूँजती रहेगी, तब तक नित्य विहार का यह दिव्य संगीत मानवता को आध्यात्मिक आनंद (Rasa) से सराबोर करता रहेगा।
समाज गायन का संगीत इसी 'नित्य विहार' का प्रतिबिम्ब है। चूँकि यहाँ वियोग नहीं है, इसलिए हरिदासी संगीत में करुण रस (दुःख) का वह रूप नहीं मिलता जो वियोग में होता है, बल्कि यहाँ 'प्रेम-वैचित्र्य ' (Prem-Vaichitraya) है—अर्थात, मिलन में भी बिछड़ने का भय। इसलिए, संगीत में एक विशेष प्रकार की 'मधुरता' और 'गंभीरता' होती है, जो ध्रुपद की प्रकृति के अनुकूल है ।
•समाज गायन की संस्था: संरचना और शैली
समाज गायन कोई साधारण कीर्तन या भजन संध्या नहीं है। यह एक अत्यंत अनुशासित और शास्त्रीय अनुष्ठान है। वृन्दावन के मंदिरों, विशेषकर टटिया स्थान और राधावल्लभ मंदिर (जो हरिवंश और हरिदास दोनों से प्रभावित है) में इसका स्वरूप अत्यंत प्राचीन है।
• बैठक व्यवस्था (Seating Arrangement) और स्वरूप
समाज गायन की बैठक व्यवस्था इस अनुष्ठान के संवादात्मक (Dialogic) स्वभाव को दर्शाती है।
संरचना: गायक दो पंक्तियों या समूहों में आमने-सामने बैठते हैं। एक समूह 'मुखिया' (Lead) होता है जो पद की पहली पंक्ति (स्थायी) उठाता है, और दूसरा समूह 'समूह' (Chorus) उसे दोहराता है या अगली पंक्ति (अंतरा) गाता है। यह शैली प्राचीन 'प्रबंध गान' की याद दिलाती है ।
स्थान: बांके बिहारी मंदिर में यह गायन 'जगमोहन' (गर्भगृह के सामने का चबूतरा) पर होता है, जहाँ गोस्वामी और सेवायत बैठते हैं। इसके विपरीत, टटिया स्थान में यह खुले आकाश के नीचे, रेत (बृज रज) पर बैठकर किया जाता है, जो संतों की विनम्रता और प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाता है ।
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