काहे भटके जंगल बस्ती, तेरा राम तेरे मन में | Kahe bhatke jangale basti
Автор: कबीर संगीत
Загружено: 2026-03-07
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पंक्तियों का विस्तृत भावार्थ
काहे भटके जंगल बस्ती, तेरा जोगी तेरे मन में।
कबीर दास जी कहते हैं 🗣️ कि हे अज्ञानी मनुष्य! तू अपने परमपिता परमात्मा को खोजने के लिए व्यर्थ ही कभी जंगलों की खाक छान रहा है तो कभी बस्तियों और तीर्थ स्थानों में भटक रहा है। 🚶♂️ जिस ईश्वर को तू बाहर ढूंढ रहा है, वह तेरा जोगी, तेरा रचयिता तो स्वयं तेरे हृदय के भीतर, तेरे अपने मन में ही बड़ी शांति से निवास करता है। ❤️ तुझे बस अपने भीतर झांकने की आवश्यकता है।
माटी की मूरत को पूजै, राम रमे हर कण में।
कबीर दास जी कहते हैं कि यह संसार कितने अज्ञान में जी रहा है जो निर्जीव मिट्टी और पत्थरों की मूर्तियों में भगवान को खोजकर उनकी पूजा कर रहा है 🗿। जबकि सत्य तो यह है कि जो सच्चे राम हैं, जो परब्रह्म हैं, उनका वास तो इस पूरी सृष्टि के रोम-रोम में और हर एक छोटे-से-छोटे कण में है। ✨ वे किसी एक स्थान या केवल एक मूर्ति तक सीमित नहीं हैं।
माथे तिलक लगाये भारी, माला फेरत उमर गई सारी।
कबीर दास जी कहते हैं 🙏 कि लोग स्वयं को बहुत बड़ा भक्त और धार्मिक दिखाने के लिए अपने माथे पर बड़े-बड़े और भारी तिलक लगा लेते हैं 卐। अपने हाथों में माला लेकर राम-नाम जपते हुए वे अपनी पूरी जिंदगी गुजार देते हैं 📿, लेकिन केवल इन बाहरी दिखावों से उन्हें सच्चे ईश्वर की प्राप्ति कभी नहीं हो पाती।
भीतर मैल कपट का राखै, उलझ गयो भरमन में।
बाहर से तो वे साधु और भक्त दिखते हैं, लेकिन अपने मन के भीतर उन्होंने दूसरों के प्रति छल-कपट, ईर्ष्या और बुराइयों का गहरा मैल इकट्ठा कर रखा है 🖤। जिस प्रकार 🪢 कोई धागा या सूत बुरी तरह उलझ जाता है और उसे सुलझाना मुश्किल हो जाता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य इन सांसारिक भ्रमों, अंधविश्वासों और झूठे आडंबरों में इतना उलझ कर रह गया है कि उसे सत्य का मार्ग दिखाई ही नहीं देता 😵💫।
ज्यों मृग नाभि बसै कस्तूरी, बन-बन सूँघत फिरत अधूरी।
कबीर दास जी कहते हैं कि जिस प्रकार 🦌 एक हिरण (मृग) की नाभि के भीतर ही अत्यंत सुगंधित कस्तूरी मौजूद होती है, लेकिन वह अपनी नादानी में उस महक को किसी और जगह से आता हुआ समझकर पूरे जंगल में पागलों की तरह उसे खोजता और सूंघता फिरता है 🌳।
दर्पण मैला रूप न दीखै, अज्ञान बसा है नयन में।
ठीक उसी प्रकार 🪞 जैसे एक धूल से सने हुए मैले शीशे (दर्पण) में इंसान को अपना असली चेहरा दिखाई नहीं देता, वैसे ही इस मनुष्य की आंखों में भी अज्ञान और मोह-माया की धूल जमी हुई है 👀। इसी अज्ञानता के कारण वह अपने ही भीतर बसे हुए उस परमपिता परमेश्वर के सच्चे रूप को कभी देख ही नहीं पाता।
बाहर की सब आस मिटा ले, अंतर-घट का दीप जला ले।
कबीर दास जी कहते हैं 🪔 कि अगर तुम सच में ईश्वर को पाना चाहते हो, तो इस दुनिया के लोगों से और इन बाहरी आडंबरों से अपनी सारी उम्मीदें हमेशा के लिए छोड़ दो। इसके बजाय, तुम अपने हृदय (अंतर-घट) के भीतर ज्ञान, प्रेम और सच्ची भक्ति का एक निर्मल दीपक जलाओ 💡, जो तुम्हारे मन के सारे अंधकार को दूर कर सके।
कहत कबीर सुनो भई साधो, प्रभु मिलिहैं इक छिन में।
अंत में कबीर दास जी कहते हैं कि हे सज्जन और साधु स्वभाव वाले मनुष्यो! मेरी बात ध्यान से सुनो 👂। जब तुम्हारे मन का सारा मैल धुल जाएगा और भीतर ज्ञान का प्रकाश हो जाएगा, तब तुम्हें उस सर्वव्यापी प्रभु के दर्शन प्राप्त करने में एक पल (छिन) की भी देरी नहीं लगेगी 😇✨। वे तुम्हें तुरंत ही तुम्हारे भीतर ही मिल जाएंगे।
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