#Dharamshala
Автор: sanskritguru 24
Загружено: 2024-06-14
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हिमाचलप्रदेश देवभूमि के नाम से यूंहि नहीं जाना जाता। इसके कोणे कोणे में सनातन आस्था के बीज देखें जा सकते हैं। आप हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित माता चिन्तपूर्णी के बारे में तो जानते ही होगें। आइए आज आपको चिन्तपूर्णी से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आध्यात्मिक आस्था के बिल्कुल शान्त वातावरण में स्थित धर्मशाला महन्ता में स्थित श्री श्री १००८ नकोदास बाबा जी की गद्दी से परिचय करवाते हैं। प्रिय दर्शकों यह ऐसी सच्ची गद्दी है जहाँ आज भी न्याय के लिए लोग माथा टेकने आते है। मान्यता है कि इस गद्दी पर जो भी जिस आस्था से आता है वह खाली हाथ नहीं जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार जिन लोगों को न्याय नहीं मिलता वे यहाँ अपनी अरदास लगाते हैं तथा उन्हें न्याय मिल जाता है, आइए आपको दिखाते है वह स्थान जहाँ भक्त अपनी अर्जी लगवाते हैं। वर्तमान में आप देख सकते हैं कि भक्तों के सहयोग से एवं यहां के पूजनीय महन्त जी के निर्देशन में बहुत ही विकासात्मक कार्य हुए हैं। मन्दिर की दिव्यता एवं भव्यता इस बात का सङ्केत देती है कि इस गद्दी पर चढ़ने बाला एक एक पैसा गद्दी के विकास के लिए खर्च किया जाता है।
इस गद्दी में मुख्यमन्दिर श्री लक्ष्मीनारायण जी का जहां पर सुबह शाम आरती होती है तथा दूर दूर से आए भक्त जन माथा टेकते हैं।
गद्दी के एक और माता गौढ़ जी के द्वारा स्थापित लंगर है जहां से कोई भूखा नहीं जाता, यह लंगर कई वर्षों से निरन्तर चल रहा है। लंगर की विशेषता पुराने समय से ऐसी रही है कि लंगर से पूर्व चारों दिशाओं में लोगों को भोजन के लिए आवाजें लगाई जाती है, और यह परम्परा आज भी जीवित है। वर्तमान में पुराने लंगर भवन की जगह नया लंगर भवन बनकर तैयार हो चुका है। लोग यहाँ इस लंगर में खून अन्नदान, धनदान करते हैं। स्थानीय भक्तों में ऐसी मान्यता है कि प्रत्येक फसल के तैयार होने पर गद्दी में उसका अंश अवश्य चढ़ाया जाता है।
आइए अब मन्दिर के पिछले भाग में चलते हैं जहाँ बाबा नकोदार जी की तपोस्थली है. इस तपोस्थली में वटवृक्ष के नीचे बाबा जी के द्वारा तपस्या की गई है।। यहाँ की एक अद्भुत बात यह है कि इस वट वृक्ष की जड़ो के पास से मिट्टी जिसे प्रसाद के रूप में स्थानीय भाषा में ऋण कहा जाता है, निकलती रहती है जो कई वर्षों से भक्तों में बांटने से कम नहीं होती। इस ऋण को लोग अपने घरों में छिड़कते हैं या किसी को भूत प्रेत इत्यादि की बाधा हो तो उसे लगाते हैं। यहाँ कि वट वृक्षों की घनी छाया साधक को तपस्या में लीन होने के लिए मजबूर कर देती है।
आइए अब आपको मन्दिर के सामने की वृहंगम दृश्य दिखाते हैं। शाम के समय अस्त होता सूर्य पश्चिम दिशा को लाल रंग की रंगिमा में रंग देता है। नीचे यहाँ पर सीढ़ियों के माध्यम से जाने पर एक बाबड़ी हैं जिससे पापखण्डिनी के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस स्थान पर स्थान करने से भूत प्रेत का प्रभाव समाप्त हो जाता है तथा किसी को शरीर में त्वचा से सम्बन्धित रोग हो तो वह भी दूर हो जाते हैं।।
आप जानते हैं कि यह देवभूमि कई रहस्यों से भरी पड़ी इसी बीच मुख सुकुन प्राप्त करने के लिए तथा आध्यात्म की दिव्यता प्राप्त करने के लिए यह स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है, इसलिए सच्चे मन में श्रद्धा एवं विश्वास रखकर इस मन्दिर में आप आऐं निश्चित रूप से आपकी हर इच्छा पूर्ण होगी।। बोलिए बाबा श्री श्री १००८ नकोदर दास जी महाराज की जय ।।
आपको हमारा संस्कृत संस्कृति के उत्थान के लिए किया गया प्रयास कैसे लगा आप कमेन्ट करके बता सकते हैं।। डा. अमनदीपशर्मा संस्कृतगुरु 24।
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