ऋग्वेद एक अस्सी: इंद्र का वज्र और वृत्र-वध HinduinfoPedia
Автор: Hinduinfopedia
Загружено: 2026-02-19
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यह प्रस्तुति ऋग्वेद मंडल एक के अस्सीवें सूक्त का क्रमबद्ध विवेचन करती है। यह सूक्त ऋषि गोतम राहूगण द्वारा दृष्ट तथा इंद्र को समर्पित है। सोलह ऋचाओं में यह स्तोत्र वृत्र-वध और जल-विमोचन की घटना का विस्तार से निरूपण करता है, तथा प्रत्येक ऋचा “अनु स्वराज्यम्” उद्घोष के साथ समाप्त होती है।
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इस प्रस्तुति में अग्नि से इंद्र तक की उन्नति का क्रम भी स्पष्ट किया गया है, विशेषतः ऋग्वेद एक अठहत्तर से एक उन्यासी तक के अग्नि-सूक्तों से अस्सीवें सूक्त में वज्र-प्रयोग तक। प्रमुख बिंदुओं में अग्रसर होने की आज्ञा, वृत्र की संरचनात्मक आधार पर प्रहार, “सहसा सहः” का उद्घोष, तथा सहस्रभृष्टि आयस वज्र का वर्णन सम्मिलित है।
सोम-प्रेरणा, निर्णायक प्रहार, जलों की मुक्ति, द्यावा-पृथिवी का कम्पन, त्वष्टा और मरुतों का उल्लेख—इन सबके माध्यम से सूक्त की पूर्ण रचना-योजना प्रस्तुत की गई है।
यह प्रस्तुति ऋग्वेद एक अस्सी का तात्त्विक एवं पाठानुसार अवलोकन है।
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