श्रीमद भगवद्गीता l भूमिका l Advance Bhagavad gita l Bhumika l
Автор: ADHYATMIK VIDYALAYA OR AIVV
Загружено: 2022-10-26
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एडवांस भगवद्गीता-भूमिका
Advance Bhagavad Gita Bhumika
‘श्रीमद् भगवद्गीता’ सम्पूर्ण विश्व में मानवजाति के लिए भगवान का वर्बली दिया हुआ भारतीय अमूल्य उपहार है। भगवद्गीता ही एक ऐसा शास्त्र है जिसको ‘सर्वशास्त्र शिरोमणि’ कहा गया है। ऐसी विलक्षण रचना है, जिसको ही ‘भगवानुवाच’ की मान्यता प्राप्त है। यह शास्त्र अन्य शास्त्रों की तरह सिर्फ़ धर्म उपदेश का साधन नहीं; अपितु इसमें अध्यात्म के साथ-2 राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक और व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान भी है। अर्जुन जो महाभारत युद्ध के महानायक हैं, युद्ध के मैदान में समस्याओं से भयभीत होकर जीवन और क्षत्रिय धर्म से निराश हो गए। उसी प्रकार हम सभी नं.वार अर्जुन की भाँति जीवन की समस्याओं में उलझे हुए हैं; क्योंकि यह कलियुगांत का जीवन भी एक युद्ध क्षेत्र है। इसलिए आज सामान्य मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं से उलझकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है अर्थात् क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए- इस संबंध में ही बुद्धू बन जाता है और जीवन की समस्याओं से लड़ने की बजाए, उनसे भागने लगता है; लेकिन समस्याओं से भागना समस्या का समाधान नहीं है। उन समस्याओं के समाधान के लिए ही भगवान अर्जुन के माध्यम से समस्त सृष्टि की मानवजाति के लिए ही गीता-ज्ञान अभी वर्तमान समय में दे रहे हैं,
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।” (गी. 4/7) अर्थात् जब धर्म की ग्लानि होती है, अधर्म या विधर्म बढ़ता है, तब मैं आता हूँ। धर्म की ग्लानि अर्थात् एकव्यापी भगवान को सर्वव्यापी बता देते हैं। जैन और वैदिक प्रक्रिया के अनुसार कलियुग के अंत में ही धर्म की ग्लानि होती है; क्योंकि कलियुग-अंत तक अनेक धर्म स्थापित हो जाते हैं
“सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥” (गीता 7/27) अर्थात् सब प्राणी कल्पान्त काल/चतुर्युगांत में सम्पूर्ण मूढ़ता को पहुँच जाते हैं।
“मयाध्यक्षेण.....जगद्विपरिवर्तते” (गीता 9/10) अर्थात् मेरी एकमात्र अध्यक्षता के कारण यह संसार विपरीत गति अर्थात् कलियुगान्त से आदि सनातन सतयुगी ऊर्ध्वलोक की दिशा में विपरीत गति से परिवर्तित होता है।
अगर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर में आकर गीता-ज्ञान दिया है तो संसार का परिवर्तन होना चाहिए; परन्तु संसार का तो परिवर्तन हुआ नहीं, प्रमाणित मानवीय इतिहास में मनुष्य और ही अधर्मी, कामी, पाखंडी, अभिमानी, क्रोधी, अहंकारी, पशुओं के समान हिंसा का आचरण करने वाले हो गए, जबकि 16 कला सतयुग, 14 कला त्रेता और 8 कला द्वापर से भी नीचे गिरकर आज तक पूरा ही कलाहीन पापी कलियुग बन गया।
वास्तव में यह सामने खड़े सन्नद्ध चतुर्थ विश्वयुद्ध वाले मौसलिक/मिसाइल्स के और तृतीय विश्वयुद्ध वाले महाभारत युद्ध के आसार वर्तमान समय की बात है।
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