Geet Govind | Divine Poetry of Jayadeva | Lord Jagannath Story | गीत गोविंद | जयदेव कृत भजन
Автор: DevineDevotion
Загружено: 2025-12-17
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गीत गोविंदम हिंदी अर्थ सहित । श्रित कमलाकुच । Geet Govind
गीत गोविंद, महाकवि जयदेव द्वारा रचित एक अद्भुत दिव्य काव्य है, जो राधा और श्रीकृष्ण के अलौकिक प्रेम को मधुर भक्ति रस में प्रस्तुत करता है।
यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भक्ति, विरह, समर्पण और परम प्रेम का शाश्वत अनुभव है।
पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर से जुड़ा यह काव्य आज भी भक्तों के हृदय को स्पर्श करता है।
जब गीत गोविंद गाया जाता है, तब भगवान स्वयं भक्त की भक्ति सुनते हैं — ऐसी मान्यता है।
यह भजन मन को शांति, हृदय को प्रेम और आत्मा को प्रभु से जोड़ देता है।
🙏 हे जगन्नाथ, हे हरे, जय जय देव हरे।
भावार्थ -
1. श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए।
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे॥
भावार्थ —
जो कमल के समान कोमल वक्षस्थल वाली लक्ष्मीजी (कमलाकुच) के आलिंगन में स्थित हैं, कानों में कुण्डल धारण किए हुए हैं, और गले में सुन्दर वनमाल पहने हैं — ऐसे हे देव, हे हरे, आपकी जय हो।
2. दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए।
मुनिजनमानसहंस जय जय देव हरे॥
भावार्थ —
जो सूर्य-मण्डल के आभूषण हैं, संसार-जन्म-मरण रूपी बन्धन को तोड़ते हैं, और मुनियों के हृदय रूपी मानस-सर में हंस के समान विहार करते हैं — हे देव, हे हरे, आपकी जय हो।
3. कालियविषधरगंजन जनरंजन ए।
यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे॥
भावार्थ —
जो कालिय नाग का विष हरकर उसे जीतने वाले हैं, सब भक्तजनों को आनन्द देने वाले हैं, और यदुवंश रूपी कमल के सूर्य हैं — हे देव, हे हरे, आपकी जय हो।
4. मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए।
सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव हरे॥
भावार्थ —
जो मधु, मुर और नरकासुर जैसे राक्षसों का संहार करने वाले हैं, गरुड़ पर आरूढ़ रहते हैं, और देवताओं के आनन्द के कारण हैं — हे देव, हे हरे, आपकी जय हो।
5. अमलकमलदललोचन भवमोचन ए।
त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे॥
भावार्थ —
जिनकी आँखें खिले हुए कमलदल के समान हैं, जो जन्म-मरण रूपी संसार से मुक्ति देने वाले हैं, और तीनों लोकों के आधार एवं निधान हैं — हे देव, हे हरे, आपकी जय हो।
6. जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए।
समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे॥
भावार्थ —
जो जनकनन्दिनी (सीता जी) द्वारा भूषित हैं, दूषण नामक राक्षस को जीतने वाले हैं, और युद्ध में दशानन रावण का संहार करने वाले हैं — हे देव, हे हरे, आपकी जय हो।
7. अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर ए।
श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे॥
भावार्थ —
जो नये जलधर (मेघ) के समान सुन्दर हैं, मंदराचल पर्वत को धारण करने वाले हैं, और चन्द्रमा जैसे मुख वाले, जिनके मुख को चकोर की तरह निहारने वाले भक्त हैं — हे देव, हे हरे, आपकी जय हो।
8. तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए।
कुरु कुशलं प्रणतेषु जय जय देव हरे॥
भावार्थ —
हम आपके चरणों में प्रणत (शरणागत) हैं, इस भाव को स्वीकार करें और हमारे कल्याण कीजिए — हे देव, हे हरे, आपकी जय हो।
9. श्रीजयदेवकवेरुदितमिदं कुरुते मृदम्।
मंगलमंजुलगीतं जय जय देव हरे॥
भावार्थ —
श्री जयदेव कवि द्वारा रचित यह सुन्दर और मंगलकारी गीत भगवान को प्रसन्न करने वाला है — हे देव, हे हरे, आपकी जय हो
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