जिन्हें पलकों पे रक्खा था, उन्हीं ने क़द नापा | कीमत-ए-एतबार | Heart Touching Ghazal
Автор: gauravgargauthor
Загружено: 2026-02-20
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कीमत-ए-एतबार — विश्वास की क़ीमत ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ एक ऐसी ग़ज़ल जो आज के दौर की सच्चाई बयां करती है... जब रिश्ते मोहरे बन जाएं, और पैसा ज़ुबान। यह ग़ज़ल उन सभी लोगों के लिए है जिन्होंने कभी किसी पर आँख मूँद कर भरोसा किया हो... और वक़्त ने उनकी औक़ात दिखा दी हो। ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 📖 LYRICS & MEANING | शब्द और अर्थ ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ मसाफ़त-ए-दहर में... अपना भी इक मक़ाम होता था, नफ़ासत-ए-दुनिया में... बड़ा ही एहतिराम होता था। हमें भी नाज़ था ख़ुद पर, हमारी साख़ ऊँची थी, ख़ुदी का ख़्वाब आँखों में... सुबह और शाम होती थी। ज़रा सा वक़्त क्या बदला, सभी के ज़र्फ़ खुल आए, जो कल तक मुंतज़िर था, वो... अजब गुमनाम होता था। सुना है अब यहाँ सिक्के... ज़ुबाँ बनकर चहकते हैं, वरना हर्फ़-ए-हक़ कहना... हमारा ही काम होता था। जिन्हें पलकों पे रक्खा था, उन्हीं ने क़द को नापा है, कि अब ज़ात-ए-बशर का... पैसा ही अंजाम होता था। फ़क़त दौलत का ख़सारा है, यहाँ रिश्ते तो मोहरे हैं, वरना दिल तो पहले भी... हर किसी का धाम होता था।
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