Sangat Ep.91 | Bhagwan Singh on Rigved, Ramayan, History, Gorakhpur, Languages & More | Anjum Sharma
Автор: Hindwi
Загружено: 2025-01-17
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Sangat Ep.91 | Bhagwan Singh on Rigved, Ramayan, History, Gorakhpur, Languages & More | Anjum Sharma
भगवान सिंह हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक, लेखक, इतिहासकार और भाषा वैज्ञानिक हैं। वे शोधपरक लेखन इतिहास और भाषा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं। उनका जन्म 1 जुलाई 1931 को गोरखपुर जनपद के गगहा गाँव में एक किसान परिवार में हुआ। उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम. ए. (हिंदी) करते हुए आरंभिक लेखन की शुरुआत सर्जनात्मक कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना से की। उन्होंने 'ऋग्वेद की परंपरा’ पर धारावाहिक लेखन किया और 'नया ज्ञानोदय’ से संबद्ध रहे।
प्रकाशित कृतियाँ और प्रमुख कृतियाँ : महाभिषग (1973) : यह गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित उपन्यास है न कि भगवान बुद्ध के। बुद्ध को भगवान बनानेवाले उस महान् उद्देश्य से ही विचलित हो गए थे, जिसे लेकर बुद्ध ने अपना महान् सामाजिक प्रयोग किया था और यह संदेश दिया था कि जाति या जन्म के कारण कोई किसी अन्य से श्रेष्ठ नहीं है और कोई भी व्यक्ति यदि संकल्प कर ले और जीवन-मरण का प्रश्न बनाकर इस बात पर जुट जाए तो वह भी बुद्ध हो सकता है। महाभिषग इस क्रांतिकारी द्रष्टा के ऊपर पड़े देववादी खोल को उतारकर उनके मानवीय चरित्र को ही सामने नहीं लाता, यह देववाद के महान् गायक अश्वघोष को भी एक पात्र बनाकर सिर के बल खड़ा करने का और देववाद की सीमाओं को उजागर करने का प्रयत्न करता है। इतिहास की मार्मिक व्याख्या वर्तमान पर कितनी सार्थक टिप्पणी बन सकती है, इस दृष्टि से भी यह एक नया प्रयोग है।
काले उजले टीले (1964); अपने अपने राम (1992); परम गति (1999); उन्माद (2000); शुभ्रा (2000); अपने समानान्तर (1970); इन्द्र धनुष के रंग (1996)। शोधपरक रचनाएँ : स्थान नामों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन (अंशत: प्रकाशित, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, 1973); आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता (1973); हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य, दो खंडों में (1987); दि वेदिक हड़प्पन्स (1995); भारत तब से अब तक (1996); भारतीय सभ्यता की निर्मिति (2004); भारतीय परंपरा की खोज (2011); प्राचीन भारत के इतिहासकार (2011); कोसंबी : मिथक और यथार्थ (2011); आर्य द्रविड़ भाषाओं का अंत संबंध (2013); इतिहास का वर्तमान (2016)।
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