बिच्छू ने विष दिया, साधु ने करुणा | ज़ेन कथा
Загружено: 2026-01-14
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जापान के उत्तरी प्रांत की ठंडी हवाएँ बह रही हैं। किगावा नदी पूरे उफान पर है, और पिघली बर्फ का पानी पत्थरों से टकराता हुआ नीचे उतर रहा है। नदी के तट पर, एक प्राचीन वृक्ष की छाया में,वृद्ध ज़ेन गुरु मास्टर रिंजाई अपने नित्य कर्म में लीन हैं। उनका चेहरा झुर्रियों से भरा है, लेकिन आँखों में वैसी ही गहराई और स्थिरता है जैसी सदियों से बहती नदी में होती है।
तभी पानी की कल-कल के बीच एक हलचल दिखाई देती है। भंवर में फँसा एक विषैला बिच्छू मृत्यु से जूझ रहा है, अपने छोटे-छोटे पैरों से बहाव को चीरने की व्यर्थ कोशिश करता हुआ।
मास्टर उसे देखते हैं। कोई विचार नहीं उठता, कोई निर्णय नहीं बनता। हाथ अपने-आप आगे बढ़ जाता है।
वे हथेली को नाव की तरह फैलाकर बिच्छू को ऊपर उठाने का प्रयास करते हैं। लेकिन भय से भरा बिच्छू स्पर्श को खतरा समझ लेता है।
डंक लगता है, एक तीखा दर्द हथेली से उठकर पूरे शरीर में दौड़ जाता है। हाथ अनायास ही झटक जाता है, और बिच्छू फिर से उसी उफनते भंवर में जा गिरता है। हथेली पर जलन फैलने लगती है, लेकिन मास्टर की दृष्टि अभी भी पानी पर टिकी हुई है। बिच्छू अब और थक चुका है, उसकी शक्ति चूक रही है।
मास्टर फिर हाथ बढ़ाते हैं। इस बार भी वही होता है।
दूसरा डंक पड़ता है, दर्द और गहरा हो जाता है, नसों में ज़हर चढ़ने लगता है, और हाथ के झटके से बिच्छू फिर बहाव में खो जाता है।
झाड़ियों के पीछे से शिष्य केन्जी यह सब देख रहा है। उसके भीतर घबराहट और गुस्सा एक साथ उठते हैं। वह गुरु का
हाथ पकड़ लेता है, रोकने की कोशिश करता है, चीखता है कि यह पागलपन है, कि यह जीव कृतघ्न है, कि यह जान ले सकता है।
लेकिन मास्टर की श्वास अभी भी शांत है।
वे बस इतना कहते हैं — “वह अभी भी डूब रहा है।”
तीसरी बार, सूजे हुए, कांपते और लहूलुहान हाथ के साथ मास्टर फिर पानी में उतरते हैं। दर्द अब भी है, लेकिन संकल्प उससे बड़ा है।
इस बार, एक सधे हुए क्षण में, वे बिच्छू को बहाव से बाहर उछाल देते हैं और उसे सूखी घास पर सुरक्षित छोड़ देते हैं।
बिच्छू जीवित है। वह एक पल भी पीछे नहीं देखता, न कोई कृतज्ञता, न कोई प्रतिक्रिया बस अपनी राह चला जाता है।
नदी फिर वैसी ही बहने लगती है। किनारे पर केवल मास्टर की गहरी साँसें सुनाई देती हैं।
शिष्य काँपते स्वर में पूछता है कि इतनी चोट के बाद भी वे ऐसा क्यों करते रहे।
मास्टर मुस्कुराते हैं और कहते हैं — “डंक मारना उसका स्वभाव है, और बचाना मेरा।”
यहीं यह कहानी ठहरती नहीं,
यहीं से वह हमारे भीतर उतरती है।
क्योंकि जीवन में भी हर दिन कोई न कोई बिच्छू हमें डंक मारता है। और असली प्रश्न यह नहीं है कि सामने वाला क्या करता है, बल्कि यह है कि हम उसके बाद क्या बन जाते हैं।
स्वभाव वही है जो चोट के बाद भी नहीं बदलता।
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