जब ज्ञान ही असुरक्षित हो…
Автор: vidhigyanam
Загружено: 2026-02-02
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हर धरम के नभ-मंडल में, एक ध्रुव तारा चमकता है,
कभी गुरु, कभी पीर, पादरी, मार्ग सभी का प्रशस्त करते है।
केवल अनुष्ठान नहीं, वो चेतना जगाते हैं,
संस्कारों के बीज बोकर, समाज को राह दिखाते हैं।
विश्व भर में अपनी अपनी, कौम का वो मान हैं,
अपने लोगों के संरक्षण में, पाते वे सम्मान हैं।
पर कैसी यह विडंबना है, अपनी ही पावन माटी पर,
जो सदियों से ज्ञान-पुंज था, खड़ा आज वह घाटी पर।
जिस ब्राह्मण ने वेद सहेजे, परंपरा का भार सहा,
आज अपने ही आँगन में, वह असुरक्षित, संदिग्ध खड़ा।
शंकाओं के घेरे में है, त्याग जिसका इतिहास रहा,
ज्ञान का वो प्राचीन पथिक, आज मौन उपहास सहा।
स्वयं जगत स्वीकार रहा है, घटती उनकी काया है,
न्याय-नीति तो यह कहती थी, अब संरक्षण की बारी है।
पर हाय! समय का खेल, उलटी यहाँ बयार बही,
संरक्षण के बदले उनको, मिली पीड़ा और मार नई।
दबाने को, बदनाम करने को, कैसे जाल बिछाए हैं,
न्याय के मंदिर में भी, उनके लिए विशेष फंदे आए हैं।
यह सत्य सनातन सब जानें, खोट हर इक मानव में है,
अपराधी मन किसी जाति का, या धर्म का नहीं सगा है।
दण्ड-विधान कठोर बने हैं, हर पापी को रोकने को,
फिर क्यों विशेष कानूनों के, तीर सजे एक को भेदने को?
समता के पावन संविधान का, यह कैसा अपमान है?
एक समुदाय को लक्ष्य बनाना, क्या यही न्याय का विधान है?
कहते हैं, जो कम हैं गिनती में, उनका हाथ पकड़ना है,
सभ्य तंत्र की यही नींव है, निर्बल का संबल बनना है।
पर यहाँ भीड़ के दबाव में, न्याय तौला जाता है,
अन्यायपूर्ण नियमों को, सत्य बोला जाता है।
यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ, संख्या बल ही हावी है?
जो कम हैं, उनकी आँखों में बस बेबसी ही भावी है।
आज प्रश्न नहीं कि कौन श्रेष्ठ है, किसकी ऊँची शान है,
प्रश्न यह है, क्या जाति-पहचान ही, दोषी का प्रमाण है?
ब्राह्मण आज नहीं माँगता, कोई सिंहासन, कोई विशेषाधिकार,
तरस रही हैं आँखें उसकी,
बस पाने को समता का व्यवहार।
वही सुरक्षा, वही मान,
जो हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है,
अपने ही देश में, अपनों से,
बस सम्मान की एक पुकार है।
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