श्रीकृष्ण और बलराम दीक्षा | भगवान नरसिंह अवतार | समुद्र मंथन की कथा | श्री कृष्ण महाएपिसोड
Автор: Tilak
Загружено: 2025-01-14
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"गुरु सन्दीपनि के आश्रम में श्रीकृष्ण व बलराम की शिक्षा प्रारम्भ होती है। ज्ञान की देवी सरस्वती स्वयं प्रकट होती हैं और पंचविद्याओं को प्रभु के ग्रहण करने हेतु समर्पित करती हैं। गुरु के आह्वान पर विद्याऐं प्रकट होती जाती हैं और प्रभु के मानस में समाती जाती हैं। माँ सरस्वती वीणा बजाती हैं और चारों वेद प्रकट होते हैं। ऋगवेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद सन्तों का रूप धारणकर आते हैं और श्रीकृष्ण में समाहित हो जाते हैं। गुरुदेव उन्हें न्यायशास्त्र, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा और वेदान्त आदि की शिक्षा भी देते हैं, श्रीकृष्ण उनकी वाणी को अपने मानस पटल पर अंकित करते जाते हैं। कृष्ण व बलराम राजनीति के गुर सीखते हैं तो अस्त्र शस्त्र में भी निपुणता प्राप्त करते हैं। गुरु संदीपनि कृष्ण को धनुष बाण से कठिन लक्ष्य को सहजता से भेदना सिखाते हैं तो हलधर बलराम को गदा चलाने में महारत हासिल कराते हैं। प्रभु सांसारिकता से आध्यामिकता का ज्ञान गुरु संदीपनि से प्राप्त करते हैं। संगीत के सभी राग भी वह सीखते हैं। कृष्ण भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र और दुर्गा सप्तशती का पाठ भी सीखते हैं। भगवान हरि को अपनी भक्ति में लीन देखकर भगवान शिव प्रसन्न मुद्रा में हैं। वे अपने नटराज रूप में नृत्य करते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा इतनी तेजी से विद्यार्जन करने से गुरु संदीपनि प्रसन्न होते हैं और कहते हैं अब मैं तुम्हें वह गुप्त विद्याएं सिखाऊँगा जो साधारण कोटि के शिष्यों को नहीं सिखायी जाती हैं। इन गुप्त विद्याओं में कुछ आसुरी विद्याऐं हैं जिनके बूते कभी-कभी असुर भी देवताओं को पराजित कर देते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ दैवीय विद्याऐं भी है जिनके बल पर देवता धर्म की रक्षा और दुष्टों का नाश कर पाते हैं। इसके अतिरिक्त वह दैवीय शक्तिया प्रदान करेंगे जिससे श्रीकृष्ण जनकल्याण कर सकें। गुरु संदीपनि कहते हैं कि मैंने अभी तक तुम्हें जीवन जीने की कला सिखायी है और मैं मरने की कला सिखाऊँगा जिससे तुम सहज मोक्ष प्राप्त कर सको। वे बताते हैं कि मृत्यु के समय प्राणी के मन में जो भाव होते हैं, उसके अनुसार उसकी अन्तगति होती है। यदि मरते समय प्राणि के मन में सम्पत्ति अथवा परिवार के प्रति मोह प्रबल होंगे तो उसके अनुसार अगला जन्म होगा और वो जन्मान्तर के चक्र में फँसा रहेगा। और यदि प्राणी मरते समय सारा मायामोह छोड़कर केवल श्रीहरि के चरणों में मन को स्थिर कर प्राणों का त्याग करे तो उसी क्षण मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो प्राणी अपने अहंकार में चूर होकर जीवन भर कामइच्छाओं में लिप्त रहेगा, उसे मरते समय श्रीहरि का स्मरण कैसे आयेगा। यह बहुत कठिन है। गुरु संदीपनि इसका निदान बताते हैं कि प्राणी को अपनी दिनचर्या में कुछ समय निकाल कर श्रीहरि का स्मरण करना चाहिये। यदि वह श्रीहरि के अवतारों की कथा का नित्य श्रवण करेगा तो उसे मरते समय भी श्रीहरि का स्मरण आयेगा। इस पर कृष्ण भगवान विष्णु के अवतारों की कथा सुनाने का सादर आग्रह करते है। गुरु सन्दीपनि पहली कथा पृथ्वी का उद्धार करने वाले भगवान विष्णु के वाराह अवतार की सुनाते हैं। एक समय दो महादैत्य हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप धरती पर अपना आतंक मचाए हुए थे। वे दोनों भाई देवताओं के शत्रु थे। पृथ्वी पर होने वाले हवन और यज्ञों से देवताओं को बल मिलता था। इसलिये हिरण्याक्ष ने अंतरिक्ष से धरती को चुरा लिया और समुद्र की गहराईयों में छिपा दिया। इससे देवता निर्बल होने लगे और क्षीर सागर में भगवान विष्णु के पास गये। तब भगवान विष्णु वाराह का रूप धारण कर परमपिता ब्रह्मा की नासिका से प्रकट हुए। उन्हें पृथ्वी समुद्र में समायी दिखायी पड़ीं। वे उसे अपने बाहरी दांतों से उठाकर बाहर निकाल लाये। यह देखकी हरिण्याक्ष ने पर्वतशिला उठाकर वाराह अवतार पर आक्रमण कर दिया। दोनों के बीच भीषण संग्राम हुआ किन्तु हिरण्याक्ष का अंत हुआ। अपने भाई के मारे जाने से हिरण्यकश्यप बहुत क्रोधित हुआ। उसने तय कर लिया कि अब पृथ्वी पर भगवान विष्णु का नाम बाकी नहीं रहेगा। और जो उसके नाम को जपेगा, उसे जीवित नहीं छोड़ा जायेगा। उसने अपनी राजसभा में यह घोषणा की कि मैं अपने त्रिशूल से विष्णु का वध करूँगा ताकि देवता निर्बल हो जाएं। हिरण्यकश्यप तपस्वी और मुनियों के आश्रम जलाकर राख करने का आदेश देता है। उसके सैनिक पूरी पृथ्वी पर हरिभक्तों का संहार करने लगते हैं। चारों ओर त्राहि त्राहि मच जाती है।
श्रीकृष्णा, रामानंद सागर द्वारा निर्देशित एक भारतीय टेलीविजन धारावाहिक है। मूल रूप से इस श्रृंखला का दूरदर्शन पर साप्ताहिक प्रसारण किया जाता था। यह धारावाहिक कृष्ण के जीवन से सम्बंधित कहानियों पर आधारित है। गर्ग संहिता , पद्म पुराण , ब्रह्मवैवर्त पुराण अग्नि पुराण, हरिवंश पुराण , महाभारत , भागवत पुराण , भगवद्गीता आदि पर बना धारावाहिक है सीरियल की पटकथा, स्क्रिप्ट एवं काव्य में बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ विष्णु विराट जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे सर्वप्रथम दूरदर्शन के मेट्रो चैनल पर प्रसारित 1993 को किया गया था जो 1996 तक चला, 221 एपिसोड का यह धारावाहिक बाद में दूरदर्शन के डीडी नेशनल पर टेलीकास्ट हुआ, रामायण व महाभारत के बाद इसने टी आर पी के मामले में इसने दोनों धारावाहिकों को पीछे छोड़ दिया था,इसका पुनः जनता की मांग पर प्रसारण कोरोना महामारी 2020 में लॉकडाउन के दौरान रामायण श्रृंखला समाप्त होने के बाद ०३ मई से डीडी नेशनल पर किया जा रहा है, TRP के मामले में २१ वें हफ्ते तक यह सीरियल नम्बर १ पर कायम रहा।
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