मनुष्य होना संयोग है या उद्देश्य? || Self-realization Tour
Автор: Self-realization Tour
Загружено: 2025-12-28
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आचार्यश्री आशुतोष अनिकेत विरचित
'जनम-मरण के पार' से कृतज्ञतासहित -
सनातन धर्म में मनुष्य जन्म को अत्यंत दुर्लभ और श्रेष्ठ माना गया है। अनगिनत योनियों में भटकने के बाद जीव को यह मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। यह जन्म केवल भोग-विलास या सांसारिक सुखों के लिए नहीं, बल्कि आत्मबोध और मोक्ष की प्राप्ति के लिए है। अन्य योनियों में जीव प्रकृति के नियमों से बँधा होता है, परंतु मनुष्य को विवेक, बुद्धि और विवेचना की शक्ति प्राप्त है, जिससे वह सत्य और असत्य में भेद कर सकता है।
मनुष्य जन्म की सबसे बड़ी महिमा यह है कि इसी शरीर में आत्मज्ञान संभव है। वेद, उपनिषद और गीता बार-बार स्मरण कराते हैं कि यह देह साधन है, साध्य नहीं। इसका सही उपयोग धर्म, कर्म और ज्ञान के मार्ग पर चलकर स्वयं को पहचानने में है। मनुष्य अपने कर्मों द्वारा अपने भविष्य को गढ़ सकता है—यही स्वतंत्रता उसे अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बनाती है।
मनुष्य जन्म का वास्तविक उद्देश्य अपने सच्चे स्वरूप को जानना, अहंकार और अज्ञान का त्याग करना तथा करुणा, प्रेम और सेवा के भाव से जीवन जीना है। जब मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए निष्काम कर्म करता है और आत्मचिंतन में प्रवृत्त होता है, तब उसका जीवन सार्थक बनता है।
अतः मनुष्य जन्म को व्यर्थ न गँवाकर, आत्मकल्याण और लोककल्याण के मार्ग पर चलना ही इस जन्म का परम उद्देश्य है। यही जीवन की सच्ची सफलता और पूर्णता है।
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यहाँ व्यक्त किए गए भाव आत्मबोध और जीवन-दर्शन के लिए हैं, न कि किसी धार्मिक विवाद के लिए।
दर्शक अपने विवेक से इसे ग्रहण करें।
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