भगवान दक्षिणामूर्ति की महिमा हिंदी में Glory of Swami Dakshinamurthy
Автор: Infinite Faith Art & Creations
Загружено: 2017-05-02
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भगवान दक्षिणामूर्ति भगवान शिव का वह रूप है जहां वह गुरु है। उनका रंग विभूति के समान सफेद है| उनके सिर पर एक अर्धचंद्र सुशोभित है, उसके पास एक माला, ल्यूट, एक सर्प और उन्होंने ज्ञान की मुद्रा बनाई हुई है । वह बहुत आकर्षक लग रहे है और उनके हाथ में एक शुभ डंडा है, जो शुद्ध और पवित्र है, इसे योगापट्टा कहा जाता है।
वह ऋषि मुनी से घिरे हैं। मुनी जमदग्नी, वसिष्ठ, भृगू और नारद और उसके बायीं तरफ मुनी भारद्वाज, सौनाक, अगस्त्य, भार्गव हैं। वह व्याख्यापीठ नामक ज्ञान की ओहदे पर बैठे है। वह बहुत शांत है और सर्पो के साथ सुशोभित हैं। वह हिरण की खाल पहनते हैं। वह कैलाश पर है।
वह पूरे ब्रह्मांड के स्वामी है।
दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्
ध्यानम्
मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वं युवानं
वर्षिष्ठांते वसद् ऋषिगणौः आवृतं ब्रह्मनिष्ठैः ।
आचार्येन्द्रं करकलित चिन्मुद्रमानंदमूर्तिं
स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥
स्तोत्रम्
विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया ।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥१॥
बीजस्याऽन्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्गनिर्विकल्पं पुनः
मायाकल्पितदेशकालकलना वैचित्र्यचित्रीकृतम् ।
मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥२॥
यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते
साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् ।
यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥३॥
नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभा भास्वरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा वहिः स्पन्दते ।
जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत्
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥४॥
देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः
स्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः ।
मायाशक्तिविलासकल्पितमहाव्यामोहसंहारिणो
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥५॥
राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात्
सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् ।
प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥६॥
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा ।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रयाभद्रया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥७॥
विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसम्बन्धतः
शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः ।
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामितः
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥८॥
भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशु पुमान्
इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम्
नान्यत् किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभोः
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥९॥
सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे
तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च संकीर्तनात् ।
सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम् ॥१०॥
दक्षिणमूर्ति का मतलब दक्षिण की ओर । लगभग सभी शिव मंदिरों की दक्षिण की ओर उनकी मूर्ति है।
वह शुभता लाते है। यदि आप विश्वास के साथ उन पर ध्यान करते हैं, तो आपकी प्रार्थनाओं पूर्ण होती है। अगर आप इसी जीवन में आत्मसाक्षात्कार पाना चाहते है,तो भगवान दक्षिणामूर्ति से प्रार्थना करें। वो आपको जागृत गुरु, सिद्ध गुरु प्रदान करेंगे।
गुरु पूर्णिमा के पवित्र दिन पर उनके द्वारा पहले गुरु शिष्या परम्पारा शुरू की गयी थी , जो हम हर साल जुलाई में मनाते हैं। उन्होंने गुरु पूर्णिमा पर 7 ऋषियों को आत्मसाक्षात्कार के योग का पहला उपदेश दिया। भगवान दक्षिणामूर्ति आपका कल्याण करे।
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