सिकंदर और फकीर (Sikander and Fakir)
Автор: Investing is Important Why ?
Загружено: 2026-02-17
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सिकंदर और डायोजनीज: क्या हम सब एक 'अंधी यात्रा' पर हैं?
इतिहास के गलियारों में एक ओर वह सम्राट है जिसने दिग्विजय का स्वप्न देखा और आधी दुनिया को अपने जूतों की धूल बना दिया—सिकंदर। दूसरी ओर एक अकिंचन, नग्न फकीर है जिसके पास न वस्त्र हैं, न शस्त्र, न कोई साम्राज्य—डायोजनीज। जब ये दो विपरीत चेतनाएं आमने-सामने आईं, तो वह क्षण केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो जीवन-दर्शनों का महासंग्राम बन गया। यह कहानी हमें उस 'अंधी यात्रा' का आईना दिखाती है जिस पर हम सब किसी न किसी रूप में सवार हैं। आखिर ऐसा क्या था उस फकीर के पास, कि एक विश्व-विजेता उसके चरणों में खड़ा होकर खुद को पहली बार बौना महसूस करने लगा?
स्वघोषित 'महानता' और अस्तित्व का बोध
जब सिकंदर डायोजनीज के पास पहुँचा, तो उसके भीतर का दंभ हिलोरे ले रहा था। उसने भारी स्वर में अपना परिचय दिया, "मैं हूँ महान सिकंदर!"
डायोजनीज, जो उस समय शीत ऋतु की गुनगुनी धूप का आनंद ले रहा था, इस परिचय को सुनकर जोर से हँस पड़ा। उसने अपनी मांद में बैठे अपने पालतू कुत्ते को पुकारा और कहा, "इधर आ और देख! एक ऐसा आदमी आया है जो स्वयं को महान कह रहा है। कुत्ते भी कभी ऐसी नासमझी नहीं करते कि खुद को महान कहें।"
यह कटाक्ष सिकंदर की अस्मिता पर गहरा प्रहार था। अपनी श्रेष्ठता का ढोल पीटना केवल मानवीय निर्बलता है। सिकंदर ने क्रोध में अपनी तलवार पर हाथ रखा, तो डायोजनीज ने बड़ी सहजता से कहा, "तलवार अपनी जगह रहने दे, बेकार मेहनत मत कर। तलवारें उनके लिए हैं जो मृत्यु से भयभीत हैं। हम तो उस पार जा चुके हैं जहाँ मृत्यु का साया भी नहीं पहुँचता। हमने उन सपनों का ही त्याग कर दिया है जिनसे मौत जन्म लेती है।"
ऐसे निर्भय व्यक्ति के सामने सिकंदर की धारदार तलवार भी बेमानी और खिलौना मात्र रह गई। सिकंदर को पहली बार अहसास हुआ कि—"पहली दफा ऊंट पहाड़ के पास आ गया है।"
"अगर भगवान हाथ-पैर जोड़कर मेरे पैरों पर सिर रख दे और कहे कि सिकंदर बन जा, तो मैं कहूँगा कि पागल हूँ क्या? इससे तो ना बनना ही बेहतर है।" — डायोजनीज
धूप में आड़ मत बनो: व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दर्शन
सिकंदर ने अपनी श्रेष्ठता के अंतिम अवशेष के रूप में डायोजनीज से पूछा कि वह उनके लिए क्या कर सकता है। उसे लगा कि वह इस फकीर की कोई 'मदद' कर पाएगा। लेकिन डायोजनीज का प्रत्युत्तर सत्ता की जड़ों को हिला देने वाला था। उसने कहा, "तुम बस इतना कर सकते हो कि थोड़े किनारे हट जाओ। तुम मेरी धूप और मेरे बीच आड़ बन गए हो।"
यह मात्र एक उत्तर नहीं, बल्कि एक शाश्वत सत्य है। अक्सर सत्ता और अधिकार हमें सुरक्षा का भ्रम देते हैं, लेकिन हकीकत में वे हमारे जीवन के सहज और नैसर्गिक सुखों के बीच की बाधा बन जाते हैं। किसी के जीवन में हस्तक्षेप न करना ही सबसे बड़ी सहायता है।
"जीवन का मूल मंत्र यही है: किसी की धूप में कभी आड़ मत बनना।"
विश्राम की विजय: क्या मंजिल और रास्ता विपरीत हैं?
सिकंदर ने बड़े उत्साह से अपनी भावी योजनाओं का विवरण दिया। डायोजनीज ने जब पूछा कि इतनी फौज और शोरगुल लेकर कहाँ जा रहे हो, तो सिकंदर की 'जीत की योजना' कुछ ऐसी थी:
पहला पड़ाव: इस पूरे जमाने को फतह करना।
दूसरा पड़ाव: हिंदुस्तान को जीतना।
तीसरा पड़ाव: चीन पर विजय पाना।
अंतिम लक्ष्य: पूरी दुनिया जीतकर निश्चिंत होकर 'आराम' करना।
डायोजनीज ने तपाक से पूछा, "यदि अंतिम लक्ष्य विश्राम ही है, तो वह तो मैं अभी इसी क्षण कर रहा हूँ। मेरा कुत्ता भी आराम कर रहा है। तुम्हारा मस्तिष्क खराब है कि तुम उस शांति को पाने के लिए पूरी दुनिया में अशांति फैलाना चाहते हो जिसे तुम अभी, इसी वक्त चुन सकते हो?"
यही जीवन की विडंबना है। हम शांति की खोज में उस रास्ते पर निकल पड़ते हैं जो केवल अशांति की ओर जाता है। डायोजनीज ने सिकंदर को तत्काल आमंत्रित किया, "अभी क्यों नहीं? मेरे पास आओ, यहाँ काफी जगह है, हम दोनों साथ विश्राम कर सकते हैं।"
महल बनाम झोपड़ा: मालकियत का बोझ
डायोजनीज का तर्क था कि गरीब का झोपड़ा अमीर के महल से कहीं अधिक विशाल होता है। अमीर के महल में दंभ और 'मालकियत' (Ownership) का इतना विस्तार होता है कि वहाँ अक्सर मालिक के लिए भी जगह कम पड़ जाती है। वह अपने ही घर में समा नहीं पाता क्योंकि उसका मन हमेशा अगले और बड़े महल की योजना में भटकता रहता है।
इसके विपरीत, फकीर का झोपड़ा असीमित है क्योंकि वहाँ 'मेरा' और 'तेरा' का भाव ही लुप्त है। डायोजनीज ने कहा, "मेरे झोपड़े की कोई मालकियत नहीं है, कोई दरवाजा नहीं है। अगर कल मैं यहाँ न भी रहूँ, तब भी तुम यहाँ आकर ठहर सकते हो।" जहाँ अधिकार का भाव समाप्त होता है, वहीं सच्ची स्वतंत्रता और विशालता का जन्म होता है।
अंधी यात्राएं और स्मृति का चक्र
सिकंदर हिंदुस्तान से लौटते हुए रास्ते में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसकी वह अंधी यात्रा कभी पूरी नहीं हुई। यह केवल सिकंदर की कहानी नहीं है; यह 'अंधी यात्राओं' की नियति है। यात्रा कभी समाप्त नहीं होती, बस यात्री समाप्त हो जाता है।
प्रकृति ने एक अद्भुत व्यवस्था की है—वह हमारे पिछले जन्मों की स्मृतियों को मिटा देती है। यदि हमें याद आ जाए कि हमने यही पद, यही प्रतिष्ठा, यही दंभ और यही दौड़ न मालूम कितनी बार पहले भी की है और हर बार खाली हाथ रहे हैं, तो यह जीवन का व्यर्थ खेल आज ही ठप्प हो जाए। हम फिर से उन्हीं अधूरे सपनों को नए उत्साह के साथ जीना शुरू कर देते हैं क्योंकि हमें अपनी पिछली विफलताओं का विस्मरण हो चुका होता है।
जब यह बोध हो जाए कि रास्ता गलत है, तो यात्रा को उसी क्षण रोक देना ही एकमात्र बुद्धिमत्ता है। यह कहना कि "मैं आधा रास्ता तय कर चुका हूँ, अब कैसे रुकूँ?" ठीक वैसा ही है जैसे कोई जानते हुए भी कुएं में गिर जाए कि वह दस कदम चल चुका है।
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