🌸Shriji Thakurji Vyahula Utsav Preparation & Tradition Details Explained | Priya Kunj | Vrindavan 🌸
Автор: Priya Kunj
Загружено: 2026-02-13
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ब्याहुले कौ समाज प्रारम्भ ◈ राग गौरी ◈
खेलत रास दुलहिनी दूलहु
सुनहु न सखी सहित ललितादिक,
निरखि-निरखि नैननि किन फूलहु ॥ १ ॥
अति कल मधुर महा मोहन धुनि,
उपजत हंस सुता के कूलहु।
थेई-थेई वचन मिथुन मुख निसरत,
सुनि-सुनि देह दसा किन भूलहु ॥ २ ॥
मृदु पदन्यास उठत कुंकुम रज,
अद्भुत बहुत समीर दुकूलहु।
कबहुं श्याम-श्यामा दशनांचल,
कच-कुच-हार छुबत भुज मूलहु ॥ ३ ॥
अति लावण्य रूप अभिनय गुन,
नाहिन कोटि काम समतूलहु।
भृकुटि विलास हास रस बरसत,
(जैश्री) हित हरिवंश प्रेम रस झूलहु ॥ ४ ॥
ब्याहुलौ उत्सव के पद
श्रीध्रुवदासजी कृत - राग बिहागरौ -
सखियन के उर ऐसी आई। ब्याह विनोद रचैं सुखदाई ॥
चहै बात सबके मन भाई। आनन्द मोद बढ्यौ अधिकाई ॥
बढ्यौ आनन्द मोद सबकें महा प्रेम सुरँग रँगी।
और कछु न सुहाइ तिनकौं युगल सेवा सुख पगी ॥
निशि द्यौस जानत नाहिं सजनी एक रस भीजी रहीं।
गोप गोपिनु आदि दुर्लभ तिहि सुखाधि दिन प्रति लहैं ॥ १ ॥
यह नव दुलहिनी अति सुकुमारी। ये नव दूलहु लाल बिहारी।
रँग भीने दोउ प्राणनि पियारे। नव सत अंगन अंग सिंगारे ॥
नव सत सिंगारे अंग अंगन झलक तनकी अति बढ़ी।
मौर-मौरी सीस सोहैं मैन पानिप मुख चढ़ी।
जलज सुमन सु सेहरे रचि रतन हीरे जगमगैं।
देखि अद्भुत रूप मनमथ कोटि रति पाँयन लगैं ॥ २ ॥
शोभा मंडप कुंजन द्वारैं। हित की बाँधी बंदनवारैं ॥
कुमकूम सों ले अजिर लिपायौ। अद्भुत मोतिनु चौक पुरायौ।
पुराय अद्भुत चौक मोतिनु चित्र रचना बहु करी।
आय दोउ ठाढ़े भये तहाँ सबन की गति मति हरी ॥
सुरंग मेहँदी रंग राचे चरण कर अति राजहीं।
विविध रागनि किंकिनी अरु मधुर नूपुर बाजहीं ॥ ३ ॥
वेदी सेज सुदेश सुहाई। मन दृग अंचल ग्रन्थि जुराई ॥
रीति भाँति विधि उचित बनाई। नेह की देवी तहाँ पुजाई ॥
पूजि देवी नेह की दोउ रति विनोद बिहारहीं।
तिहि समै सखी ललितादि हित सौं हेरि प्राण वारहीं।
एक वैस सुभाव एकै सहज जोरी सोहनी।
एक डोरी प्रेम की ध्रुव बँधे मोहन-मोहिनी ॥ ४ ॥
राग बिहागरौ
श्रीवृन्दावन धाम रसिक मन मोहई। दूलहु-दुलहिन ब्याह सहज तहाँ सोहई ॥ १ ॥
नित्य सहाने पट अरु भूषण साजहीं। नित्य नवल सम वैस एक रस राजहीं ॥ २ ॥
सोभा कौ सिरमौर चंद्रिका मोर की। बरनी न जाई कछू छबि नवल किशोर की ॥ ३ ॥
सुभग माँग रँग रेख मनौं अनुराग की। झलकत मौरी सीस सुरंग सुहाग की ॥ ४ ॥
मणिनु खचित नव कुंज रही जगमग जहाँ। छबि कौ बन्यौ बितान सोई मंडप तहाँ ॥ ५ ॥
बेदी सेज सुदेस रची अति बानि कै। भाँति-भाँति के फूल सुरंग बहु आनि कै ॥ ६ ॥
गावत मोर मराल सुहाए गीत री। सहचरि भरी आनन्द करत रस रीति री ॥ ७ ॥
अलबेले सुकुँवार फिरत तिहि ठाँव री। दृग अंचल परी ग्रन्थि लेत मन भाँवरी ॥ ८ ॥
कँगना प्रेम अनूप कबहुँ नहिं छूटही। पोयौ डोरी रूप सहज सो न टूटही ॥ ९ ॥
रचि रहे कोमल कर अरु चरण सुरंग री। सहज छबीले कुँवर निपुन सब अंग री ॥ १० ॥
नूपुर कंकण किंकिणी बाजे बाजही। निर्तत कोटि अनंग नारि सब लाजहीं ॥ ११ ॥
बाढ्यौ है मनमाहिं अधिक आनन्द री। फूले फिरत किशोर वृन्दावन चन्द री ॥ १२ ॥
सखियन किये बहु चार अनेक विनोद री। दूधा भाती हेत बढ्यौ मन मोद री ॥ १३ ॥
ललित लाल की बात जबहि सखियन कही। लाज सहित सुकुमारि ओट पट दै रही ॥ १४ ॥
नमित ग्रीव छबि सींव कुँवरि नहिं बोलहीं। बुधि बल करत उपाय घूँघट पट खोलहीं ॥ १५ ॥
कनक कमल कर नील कलह अति कल बनी। हँसत सखी सुख हेरि सहज शोभा धनी ॥ १६ ॥
बाम चरण सौं सीस लाल कौ लावहीं। पानी वारि कुँवरि पर पियाहि पियावही ॥ १७ ॥
मेलि सुगंध उगार सो बीरी खाबावहीं। समझि कुँवरि मुसकाइ अधिक सुख पावही ॥ १८ ॥
और हास-परिहास रहिस रस रँग रह्यौ। नित्य विहार विनोद यथा मति कछु कह्यौ ॥ १९ ॥
अंचल ओट असीस सखी सब देंही री। पल-पल बढ़ौ सुहाग नैन सुख लेहीं री ॥ २० ॥
जैसें नवल विलास नवल नवला करौं। मन-मन की रुचि जान नेह बिधि अनुसरै ॥ २१ ॥
बैठी हैं निज कुंज कुँवरि मन मोहिनी। झलकत रूप अपार सहज अति सोहनी ॥ २२ ॥
चाहि-चाहि सो रूप रसिक सिरमौर री। भरि आए दोउ नैन भई गति और री ॥ २३ ॥
अति आनन्द को मोद न उरहि समात री। रीझि-रीझि रस भीजि आपु बलि जात री ॥ २४ ॥
अरुझे मन अरु नैन बढ्यौ अनुराग री। एक प्राण द्वै देह नागर अरु नागरी ॥ २५ ॥
यौ राजत दोउ प्रीतम हँसि मुसिकात री। निरखि परस्पर रूप न कबहुँ अघात री ॥ २६ ॥
तिनही के सुख रंग सखी दिन रँगमगीं। और न कछु सुहाइ एक रस सब पगीं ॥ २७ ॥
उभय रूप रससिंधु मगन जहाँ सब भये । दुर्लभ श्रीपति आदि सोई सुख दिन नये ॥ २८ ॥
जैश्री हित ध्रुव मंगल सहज नित्य जो गावहीं। सर्वोपरि सोई होइ प्रेम रस पावहीं ॥ २९ ॥
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गोस्वामी श्रीरूपलालजी महाराज कृत
गोस्वामी श्रीरूपलालजी महाराज कृत (अस्सीस कौ पद)
लाड़ी जू थारो अविचल रहौ जी सुहाग।
अलकलड़े रिझवार छैल सौ , नित नव बढ़ौ अनुराग ॥
यौ नित विहारौ ललितादिक सँग, वृन्दावन निजु बाग।
(जयश्री) रूप अली हित जुगल नेह लखि मानत निजु बड़भाग ॥
Timecodes
0:00 Radhavallabh shri harivansh
0:43 Haldi / हल्दी
1:43 Mehendi / मेहंदी
2:54 Baraat / बारात
3:52 Gathjoda / गठजोड़ा
4:28 Sehera / सेहरा
4:51 Kalash Isthapana / कलश इस्थापना
5:03 Byahula Utsav Pad or Vidhi / ब्याहुला उत्सव पद एवं विधि
12:17 Byahula Utsav Ki Badhai Ho / ब्याहुला उत्सव की बधाई हो
13:21 Byahula Utsav Ka Anand Lein / ब्याहुला उत्सव का आनंद लें
This video shares the preparations for the upcoming Priya Pritam Byvhula Utsav, along with a detailed explanation of its tradition and significance according to the Radhavallabh Ji Mandir.
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