श्री काशी विश्वनाथ शयन आरती |। Shri Kashi Vishwanath Shayan Aarti ॥ काशी ॥ वाराणसी
Автор: Gopal Khetani
Загружено: 2024-07-20
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द्वादश ज्योतिर्लिंग श्री काशी विश्वनाथ बाबा की शयन आरती के दर्शन किजीए। हर हर महादेव; हर हर शंभू।
आरतीः
जय देव जय देव जय हरिहरा, ॐ जय हरिहरा । हे गङ्गाधर गिरिजावर, गङ्गाधर गिरिजावर ।
हर शिव ॐकाराऽ । हर-हर-हर-महादेव ॥१॥
जय देव जय देव जय हरिहरा.......॥
लक्ष्मीवर उमयावर शङ्कर साँवरिया, ॐ शङ्कर साँवरिया । हे शिवहर नटवर साधु, शिवहर नटवर साधु ।
नीलकण्ठ उमयाऽ । हर-हर-हर-महादेव ॥२॥
नन्दी-वाहन-खगवाहन त्रिशूलधारी, ॐ जय त्रिशूलधारी । त्रिपुरारी हे मुरारी, त्रिपुरारी हे मुरारी ।
जय कमलाधारी । हर-हर-हर-महादेव ॥३॥
पीताम्बर बाघाम्बर शिव स्वामी पहिने, ॐ शिव स्वामी पहिने । हे कमला-नयना देखो, कमला-नयना देखो ।
शिव के त्रिनयनाऽ । हर-हर-हर-महादेव ॥४॥
जय देवन् के देव शिवजी हालाहल, ॐ शिवजी हालाहल । हे कोटि महल के योगी, कोटि महल के भोगी ।
शोभे मुण्डमालाऽ । हर-हर-हर-महादेव ॥५॥
चन्दनचर्चित तिलकं शिव शम्भो भस्मी अङ्गे हो, ॐ जय भस्मी आङ्गे । हे रामा हॄदया रखते, रामा हॄदया रखते ।
उमया अर्धङ्गेऽ । हर-हर-हर-महादेव ॥६॥
हरि वसते वैकुण्ठे श्म्भो जी कैलासे, ॐ शिवजी कैलासे । हे हर गोरा हरि काला, शिव गोरा हरि काला ।
जापर मन भावेऽ । हर-हर-हर-महादेव ॥७॥
देवन में महादेव जय सुन्दर साधू, ॐ जय सुन्दर साधू । हे हरि-हर नाथ विधाता, शिवहर नाथ विधाता ।
निज जरणन राखोऽ । हर-हर-हर-महादेव ॥८॥
एकहि एक सरूप अन्तर ना राखो, ॐ अन्तर ना राखो । हे साधू हरि को भजता, साधू शिव-शिव जपता ।
भवसागर तरताऽ । हर-हर-हर-महादेव ॥९॥
शिवजी के हृदयकमल में वास तुम्हारो बसिया रघुराया, हो बसिया रघुरायाऽ ।
हे सेवत हैं संतन और साधू, सेवत हैं संतन और साधू ।
जापर हरिदायाऽ। हर-हर-हर-महादेव ॥१०॥
जय शिव ॐकारा, हो बाबा भज शिव ॐकाराऽ । त्रिशूल डमरू शोभय, त्रिशूल डमरू शोभय ।
शोभय मुण्डमालाऽ । ॐ हर-हर-हर-महादेव ॥११॥
ॐ जय हर-हर महादेव जय शिव ॐकारा, हो मन भज शिव ॐकारा । त्रिशूल डमरु शोभय, त्रिशूल डमरु शोभय । शोभय मुण्डमालाऽ । ॐ हर-हर-हर-महादेव ॥१२॥
हे शिव के ऊपर सोना सोहे नन्दी वाहना, बाबा नन्दी वाहना । हे नीलकण्ठ त्रिपुरारी, नीलकण्ठ त्रिपुरारी ।
भक्तन मन मोहाऽ । ॐ हर-हर-हर-महादेव ॥१३॥
हे जटाधारी शङ्कर शिव दानी भोला, हो बाबा हर दानी भोला । हो भोले भस्मी शम्भो, भोले भस्मी शिवजी ।
भक्तन मन मोहाऽ । ॐ हर-हर-हर-महादेव ॥१४॥
॥ कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् । सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ॥
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