जैसे ही तुम जान जाते हो कि तुम हो | तुम अमर होना चाहते हो | Nisargadatta Maharaj
Автор: Spiritual Spirit
Загружено: 2025-10-08
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जैसे ही तुम जान जाते हो कि तुम हो | तुम अमर होना चाहते हो | Nisargadatta Maharaj
इस अध्याय में श्री निसर्गदत्त महाराज चेतना की सबसे गहरी परत को उजागर करते हैं — उस क्षण को जब पहली बार “मैं हूँ” की अनुभूति जागती है।
महाराज बताते हैं कि जैसे ही तुम जान जाते हो कि “तुम हो”, उसी क्षण यह इच्छा उठती है कि “मैं सदा रहूँ” — यही माया का आरंभ है।
बचपन, आत्मचेतना और अस्तित्व का यह भाव —
सब एक भ्रम की यात्रा का हिस्सा हैं।
महाराज कहते हैं कि “बाल्यावस्था स्वयं एक धोखा है”,
क्योंकि उसी क्षण से पीड़ा, भय और अस्तित्व की लालसा शुरू होती है।
यह वार्ता दिखाती है कि
आत्मचेतना (Self-awareness) कैसे “मैं हूँ” की लत पैदा करती है।
जीवन और मृत्यु दोनों एक ही भ्रम के दो पहलू हैं।
जब हम यह समझ लेते हैं कि “बचपन” और “मैं हूँ” दोनों मिथ्या हैं,
तभी हम निर्गुण (Nirguna) और निर्वाण (Nirvana) की अवस्था को छूते हैं।
जैसे ही अस्तित्व का बोध हुआ, माया ने जन्म लिया।”
“जो इसे पहचान लेता है, वही मुक्त होता है।”
यह अध्याय केवल दर्शन नहीं है —
यह आत्मा की परतों को हटाने वाली जीवित शिक्षा है।
महाराज के शब्द हमें भीतर झाँकने को मजबूर करते हैं,
जहाँ अस्तित्व से परे, शांत साक्षी (Pure Witness) विराजमान है।
🎧 यह ऑडियोबुक आपको बचपन से लेकर चेतना की अंतिम सीमा —
परब्रह्म (Parabrahman) तक की यात्रा पर ले जाती है।
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