धरती से उठा, धरती में लौटने वाला | adarsh
Автор: Adarsh
Загружено: 2025-09-26
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मिट्टी ही हूँ! थोड़ा शरीर होकर घूमने निकला हूँ।”
यह वाक्य सिर्फ़ कविता नहीं, बल्कि हमारी पूरी मानव-यात्रा का सार है।
हम धरती की ही मिट्टी से बने हैं, और कुछ समय के लिए हमें शरीर का रूप मिला है—देखने, सुनने, महसूस करने और अनुभव करने के लिए।
यह पॉडकास्ट-स्टाइल मोनोलॉग आपको जीवन की नश्वरता, विनम्रता और करुणा की गहराई में ले जाएगा।
हमारे अहंकार, दौड़-भाग और संग्रह की चाह के बीच यह याद दिलाएगा कि असली मूल्य उसी में है जो हम दूसरों के लिए छोड़ जाते हैं—प्रेम, करुणा और सुंदरता।
🎧 इस यात्रा में डूबिए और खुद से कहिए—
“हाँ, मैं मिट्टी हूँ…
थोड़ा शरीर होकर घूमने निकला हूँ।”
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