धर्म के नाम पर 'धंधा'? ज्योतिबा फुले की वो किताब जिसने 150 साल पहले ही सब सच लिख दिया था!
Автор: दो कटिंग चाय और किताबें | Do Cutting Chai
Загружено: 2026-02-14
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क्या कभी आपने सोचा है कि जन्म, शादी और मौत—हर मौके पर हमें एक बिचौलिये (Middleman) की ज़रूरत क्यों पड़ती है? क्या ईश्वर और भक्त के बीच किसी एजेंट का होना ज़रुरी है? 1869 में महात्मा ज्योतिबा फुले ने इसी सवाल को उठाकर समाज की नींद उड़ा दी थी।
दोस्तों, आज 'दो कटिंग चाय और किताबें' में हम पन्ने पलट रहे हैं महात्मा ज्योतिबा फुले की कालजयी रचना "ब्राह्मणांचे कसब" (Priestcraft Exposed) के। यह केवल एक किताब नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की मशाल है। इसमें फुले जी ने बहुत ही बारीकी से और काव्यात्मक व्यंग्य (Abhangs) के माध्यम से समझाया है कि कैसे एक आम इंसान (शूद्र/अति-शूद्र) अज्ञानता के कारण पुरोहित वर्ग के जाल में फंसता चला जाता है।
फुले जी ने अपनी प्रस्तावना में स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष से नफरत करना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को उजागर करना है जहाँ धर्म की आड़ में भोले-भाले किसानों और मजदूरों को लूटा जाता है। यह किताब हमें बताती है कि कैसे शिक्षा (Vidya) की कमी हमें मानसिक गुलाम बना देती है और कैसे 'भटजी' (पुरोहित) जन्मपत्री से लेकर श्राद्ध तक, हर रस्म में अपना मुनाफा देखते हैं।
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