Cultural & Village tourism in Govind Wildlife Sanctuary & National Park | Uttarkashi, Uttarakhand
Автор: Govind Wildlife Sanctuary & National Park Official
Загружено: 2024-03-17
Просмотров: 1865
Описание:
Embark on a mesmerizing journey into the heart of Uttarakhand's natural and cultural heritage with our documentary on Govind Wildlife Sanctuary and National Park, Uttarkashi.
Explore the traditional architecture of the region, with ancient wooden houses adorned with intricate carvings depicting local flora and fauna. These houses, crafted from locally sourced wood and stone, utilize unique techniques to withstand natural disasters like earthquakes, ensuring the safety of inhabitants for centuries.
Experience the symbiotic relationship between humans and animals in these villages, where intricate architectural designs facilitate natural ventilation, keeping the houses cool in summer and warm in winter.
Immerse yourself in the rich cultural tapestry of Uttarakhand during the winter festivals, where traditional music, dance, and vibrant attire adorn the celebrations. From the rhythmic beats of dhols to the graceful movements of Pandav Nritya, every aspect of these festivals reflects the state's cultural heritage.
Join us as we delve into the intricate craftsmanship of traditional attire, handwoven by locals using wool from sheep. These garments, adorned with vibrant patterns, not only showcase the region's cultural diversity but also serve as a testament to the ingenuity of its people.
Through this documentary, the Uttarakhand Forest Department endeavors to promote sustainable tourism, fostering a deeper connection between travelers and the cultural richness of the region. By reducing the pressure on sensitive biodiversity hotspots like Har Ki Doon and Kedarkantha, we aim to create new sources of income for local communities while conserving nature in its pristine form.
_______________________
ये है जैव विविधता के रंगों से सरोबार हिमालय पर्वत का वो दुर्गम अंचल, जिसके आँगन में बहती स्वच्छ - निर्मल नदियों का मधुर संगीत दिल और दिमाग को गहरा सुकून देता है | यहाँ से दिखाई देने वाली स्वर्गारोहिणी चोटी के बारे में, प्राचीन मान्यता है कि महाभारत काल में युधिष्ठिर ने अन्य पांडवो सहित इसी चोटी से स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया था |
ये है उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में स्थित Govind Wildlife Sanctuary और नेशनल पार्क जो प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत और अनमोल खजाना है |
ये साँकरी गाँव है। यहाँ से शुरू होता है एक ऐसा सफर जो पर्यटकों को अपने प्राकृतिक सौंदर्य के सम्मोहन में बाँध लेता है | इस सफर के दौरान देखने को मिलते हैं सुपिन नदी के किनारे बसे हुए वो गांव , जिनमें आज भी उत्तराखंड की लोक संस्कृति अपने वास्तविक रूप में एक प्राचीन धरोहर की तरह मौजूद है ।
इन गांवो में लकड़ी के बने हुए प्राचीन घर देखने को मिलते हैं | घरों के मुख्यद्वार पर फूल, पत्तियों और जानवरो के चित्रों की सुन्दर नक्काशी यहाँ के वाशिंदो की रचनात्मत्कता और बेजोड़ कारीगरी का परिचय देती है लकड़ी और पत्थर जैसी स्थानीय सामग्री से तैयार इन घरों को भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखने के लिए एक ख़ास तकनीकी का प्रयोग किया जाता है | यहाँ मौजूद कुछ घर 300 वर्ष से भी ज्यादा पुराने हैं |
सांकरी से हर की दून घाटी के बीच की इस मनमोहक और रोमांचक यात्रा में तालुका, ढाटमीर , गंगाड , ओस्ला, आदि कई गाँवों के जनजीवन को देखने और उनकी संस्कृति को करीब से जानने का लुत्फ़ उठाया जा सकता है | सरलता और सादगी पूर्ण जीवन को पसंद करने वाले यहाँ के लोगों का आहार भी उनके व्यवहार की तरह ही सरल लेकिन स्वाद और पौष्टिकता का मिश्रण होता है | बाड़ी, सीडे, बुखाणा या मूडी , पोले, कंडाली की सब्जी, सूखा मांस जैसे व्यंजन इन लोगो के दैनिक भोजन का प्रमुख हिस्सा हैं |
इस सम्पूर्ण क्षेत्र में महाभारत की किवदंतियां बहुत प्रचलित हैं | इस बात का जीता जागता प्रमाण हैं , यहाँ के गाँवो में प्राचीन हिंदू वास्तुकला की तर्ज पर बने हुए भगवान सोमेश्वर महाराज के मंदिर | इन मंदिरों पर वनस्पतियों और जीवों की नक्काशी एक तरफ जहाँ जैव विविधता के संरक्षण का संदेश देती हुई प्रतीत होती है वही दूसरी तरफ यहाँ के लोगों का अपनी कला, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव भी दर्शाती है |
वास्तु कला के साथ ही यहां के लोगों द्वारा पहने गए रंग-बिरंगे परिधान बरबस ही सैलानियों का ध्यान अपनी तरफ खींच लेते हैं | कमाल की बात ये है कि ये सारे पारम्परिक परिधान घर के बने लकड़ी के हथकरघे पर हाथ से बुनकर बनाए जाते हैं | इन्हे बनाने के लिए भेड़ की ऊन का उपयोग किया जाता है | ये परिधान शून्य से नीचे के तापमान में भी शरीर को ठंड से बचाने की क्षमता रखते हैं |
जनवरी से लेकर मार्च के मध्य यानी शीत ऋतु में यहाँ कई मेलों और उत्सवों का आयोजन किया जाता है | स्थानीय रीति-रिवाजों से सुसज्जित ये उत्सव उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का आईना हैं ।
बर्फ से ढकी चोटियों की पृष्ठभूमि में प्राचीन संस्कृति और सुंदरता का ये मनोरम ताना-बाना किसी के लिए भी एक बेहद रोमांचक और अविस्मरणीय अनुभव साबित हो सकता है | इसलिए गोविन्द वन्य जीव विहार और नेशनल पार्क के वन विभाग द्वारा sustainable tourism को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है | ताकी हर की दून और केदारकांठा की संवेदनशील जैव विविधता पर पर्यटन के बढ़ते दवाब को कुछ कम किया जा सके साथ ही पर्यटकों का ध्यान कल्चरल और विलेज टूरिज्म की तरफ आकर्षित किया जा सके | ऐसा होने से स्थानीय समुदायों और वन विभाग के लिए स्थायी आय उत्पन्न करने के नए स्रोतों खुलेंगे और प्रकृति का सरंक्षण बेहतरीन तरीके से संभव हो पायेगा |
#culturetourism
#villagetourism
#uttarakhand
Повторяем попытку...
Доступные форматы для скачивания:
Скачать видео
-
Информация по загрузке: