।। किशोरी ये अभिलाषा मन में ।। श्री सरस माधुरीजी ।। Shri Indresh Ji ।। Kishori Ye Abhilasha Man Mein
Автор: त ल ह टी | Talhati
Загружено: 2024-04-05
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पद रचना - श्री सरस माधुरी जी
श्री सरस माधुरी शुक संप्रदाय के ब्रज के रसिक संत हैं जो जयपुर के रहने वाले थे, जिनके शिष्य श्यामा सखी (या सनम साहिब) थे।
किशोरी ये अभिलाषा मन में ।
सेवत रहूँ श्री रजधानी श्री मत वृन्दावन में ॥ [1]
रसिकन संग रंग सो विचरो, यमुना पुलिन लतन में ।
राधे नाम रटो रसना सो प्रेम पुलक हू तन में ॥ [2]
निशाअरु दिवस निरंतर मेरौ, बीते भाव भजन में ।
सरस माधुरी वास दीजिये, निज परिकर अलियन में ॥ [3]
श्री सरस माधुरी
हे किशोरी जी, मेरे मन में अभिलाषा है कि मैं श्री वृंदावन धाम जैसी रजधानी में आपकी नित्य सेवा करूँ । [1]
मैं सदा रसिक संतों के संग, यमुना के तट पर लताओं के मध्य, तुम्हारे प्रेम में रँग कर विचरण करूँ । ऐसी कृपा करो कि "राधे" नाम के रटने मात्र से ही मेरे तन में पुलक हो जाए । [2]
ऐसी कृपा हो कि मेरी हर रात्रि, हर दिन, हर पल, हर भाव आपके भजन में ही व्यतीत हो । श्री सरस माधुरी कहते हैं, "कृपया कर मुझे भी अपने निज परिकर सखियों में वास प्रदान कीजिए"। [3]
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