गौरा गौरी विसर्जन 2025‼️ राजनांदगांव (छ. ग.)
Автор: Yogesh Sharma YS Vlogs
Загружено: 2025-10-29
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छत्तीसगढ़ी गौरा गौरी विसर्जन परंपरा
छत्तीसगढ़ी गौरा-गौरी विसर्जन परंपरा एक बहुत ही महत्वपूर्ण और लोकभावनाओं से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा है। यह पर्व छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में बड़े उत्साह, श्रद्धा और सामूहिकता के साथ मनाया जाता है। नीचे इसकी प्रमुख बातें विस्तार से दी गई हैं —
🌿 गौरा-गौरी पर्व का अर्थ
गौरा-गौरी (या गौरी-गौरा) भगवान शिव (गौरा) और पार्वती (गौरी) के विवाह एवं दांपत्य जीवन का प्रतीक है।
यह पर्व पति-पत्नी के प्रेम, सामंजस्य और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
📅 समय
यह पर्व दीपावली के कुछ दिन पहले या कुंवर (आश्विन) महीने के अंत में मनाया जाता है।
कुछ क्षेत्रों में इसे भादो माह की पूर्णिमा के बाद भी मनाया जाता है, यह स्थानीय परंपराओं पर निर्भर करता है।
🪔 गौरा-गौरी की स्थापना
गाँव की महिलाएँ नदी या तालाब से मिट्टी लाकर गौरा (शिव) और गौरी (पार्वती) की मूर्तियाँ बनाती हैं।
मूर्तियाँ घर या गाँव के चौक में मंडप बनाकर स्थापित की जाती हैं।
पूजा के दौरान महिलाएँ पारंपरिक गीत, ढोलक, मंजीरा और नाचा-गीत करती हैं।
🎶 भक्ति गीत और नृत्य
"गौरा-गौरी खेलन जाबो", "सांवरिया मोर गौरा राजा" जैसे लोकगीत गाए जाते हैं।
पुरुष और महिलाएँ दोनों समूह बनाकर नाच-गान में शामिल होते हैं।
यह समय गाँव में मेल-मिलाप और आनंद का होता है।
🌊 गौरा-गौरी विसर्जन परंपरा
पाँचवें या सातवें दिन, पूरे गाँव के लोग गौरा-गौरी की मूर्तियों को विसर्जन के लिए नदी या तालाब तक लेकर जाते हैं।
इस यात्रा को “गौरा जत्रा” या “गौरा बिदाई” कहा जाता है।
लोग झंडे, बाजे, नगाड़े, नाच-गान के साथ शोभायात्रा निकालते हैं।
विसर्जन स्थल पर पहुँचकर देवी-देवता की आरती, गीत और नाच होता है।
अंत में मूर्तियों को जल में प्रवाहित किया जाता है — इसे गौरा-गौरी बिदाई कहा जाता है।
🌸 सामाजिक महत्व
यह पर्व सामूहिक एकता और गाँव की संस्कृति को मजबूत करता है।
महिलाएँ इस अवसर पर अपने वैवाहिक सुख, परिवार की समृद्धि और सौभाग्य की कामना करती हैं।
यह परंपरा लोककला, लोकगीत और लोकनृत्य के संरक्षण का भी माध्यम है।
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