New Noha 2025 | Mere Hussain Ka Kya Haal Kar Diya | Aarif Ravish Nohay 2025 | 10 Muharram Noha 2025
Автор: Azadari Chitora
Загружено: 2025-07-02
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New Noha 2025 | Mere Hussain Ka Kya Haal Kar Diya | Aarif Ravish Nohay 2025 | 10 Muharram Noha 2025
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Tittle - Mere Hussain Ka Kya Haal Kar Diya
Reciter - Aarif Ravish Karbalai Sankhnavi
Poet - Mansoor Abbas Sankhnawi
Vocals - Ars Sankhnavi
Chorus- Raza Jafri & Team
Audio - ODS
Digital Partner - RhythmReach
Video - @AzadariChittora
Lyrics :-
जब शाहे दीं के खून में डूबी थी कर्बला
ता अर्श आहो ज़ारी थी कोहराम था बापा
एक लाश थी पड़ी हुई लाशों के दरमियां
उस लाश से लिपट के ये कहती थी एक मां
आती हे रन से आज भी उस मां की वो सदा
हए हए मेरे हुसैन का क्या हाल कर दिया
1 यसरब का शाहाज़ादा था फरजंदे मुस्तफा
आते थे इसको झूला झुलाने मलाइका
आया था जिसके वास्ते ज़न्नत से पे रहन
अफसोस उसको आज मय्यसर नहीं कफ़न
कितना गरीब हो गया नूरे नज़र मेरा
हए हए मेरे हुसैन का क्या हाल कर दिया
2 क्या क्या सितम हुए है मेरे दिल के चेन पर
मारे हे तीर बरछियां भाले हुसैन पर
ज़ख्मों से मेरे लाल का तन है भरा हुआ
सीने में तीर पहलू में नेज़ा गढ़ा हुआ
इस हाल में ज़मीन पे मेरा पिसर गिरा
हए हए मेरे हुसैन.....
3 जब आखिरी हुसैन ने सजदा अदा किया
सुब्हाना रब्बी आला की आने लगी सदा
ओर जिस्म में थे तीर तबर सारे आर पार
कहता था आओ अम्मा संभालो ये बार बार
बे पर तड़प रहा हे तुम्हारा ये लाडला
हए हए मेरे हुसैन...
4 बरसाए तीर सबरो रज़ा के अमीन पर
मेरा हुसैन ज़ीन पे था ना ज़मीन पर
बैठा जो शिमर पुश्त पे खंजर लिए हुए
सीने के सारे तीर कमर से निकल पड़े
एक तीर मेरे लाल के दिल में उलझ गया
हए हए मेरे हुसैन...
5 लाशे उठा उठा के गमों से निढाल हे
सोचा ना ये किसी ने मोहम्मद का लाल है
इब्ने अनस ने मारा है नेज़ा हुसैन को
गेसू पकड़ के शिमर ने खींचा हुसैन को
हर एक सितम हुसैन पे हद से सिवा हुआ
हए हए मेरे हुसैन...
6 जब सर कटा हुसैन का ख्वाहर थी सामने
ख्वाहर से आगे शाहा की दुख्तर थी सामने
ज़ैनब ये हाल देख के ग़श खाके गिर पड़ी
लगता था जैसे बाली सकीना तो मर गई
ज़र्बो पे ज़र्ब मर के जब सर किया जुदा
हए हए मेरे हुसैन..
7 आंखों के सामने ये सितम शिमर ने किया
ऐड़ी से दस्तए पाक को उसने कुचल दिया
फिर बेरहम ने मार के ठोकर हुसैन को
गोदी में मेरी कर दिया बे सर हुसैन को
रूह कांपती थी मेरी वो मंजर अजीब था
तीरों तबर थे और हुसैन ए गरीब था
थे जिस जगह पे ज़ख्म शहै मशरक़ैन के
नेज़े वही चुभोते थे ज़ालिम हुसैन के
हर दर्दनाक जुल्म मेरे सामने किया
हए हए मेरे हुसैन....
8 ऐसा सितम जहां में किसी पर नहीं हुआ
मंसूर जो हुसैन पे रन में किया गया
ज़ालिम ने ज़ुल्फेपाक पकड़ कर हुसैन की
नब्ज़े हयात काट दी ज़ेहरा के चैन की
आरिफ रविश के साथ पढ़ो सब ये मर्सिया
हए हए मेरे हुसैन...
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